धर्म-अध्यात्म

दिवाली के बाद सूप पीटने की अनोखी परंपरा, जानें इसका धार्मिक महत्व

Rajeshwari Nishad
8 Nov 2026 7:54 PM IST
दिवाली के बाद सूप पीटने की अनोखी परंपरा, जानें इसका धार्मिक महत्व
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धर्म। दिवाली का त्योहार मां लक्ष्मी के स्वागत और सुख-समृद्धि की कामना का पर्व है। इस दिन लोग अपने घरों को दीपों, रंगोली और फूलों से सजाते हैं। शाम को विधि-विधान से माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि दिवाली की रात मां लक्ष्मी घर में पधारती हैं और अपने भक्तों को धन-धान्य, सुख और वैभव का आशीर्वाद देती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां लक्ष्मी का स्वागत करने के अगले दिन घर से दरिद्रता को बाहर निकालने की भी एक खास परंपरा निभाई जाती है? इस परंपरा को कई जगहों पर 'सूप पीटना' या 'दरिद्र निकालना' कहा जाता है।
यह परंपरा विशेष रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों में प्रचलित है। इसके तहत दिवाली की अगली सुबह घर की महिलाएं या परिवार के बुजुर्ग बांस के सूप को डंडे से पीटते हुए घर के अलग-अलग हिस्सों में घूमते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर से दरिद्रता और नकारात्मकता बाहर जाती है तथा मां लक्ष्मी का स्थायी वास बना रहता है।
दिवाली के अगले दिन क्यों पीटा जाता है सूप?
धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार, दिवाली की रात माता लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है। वहीं, अगली सुबह घर से दरिद्रता यानी अलक्ष्मी को बाहर निकालने का प्रतीकात्मक विधान किया जाता है।पारंपरिक मान्यता में अलक्ष्मी को दरिद्रता, अभाव और दुर्भाग्य से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि जिस तरह दिवाली की रात घर में दीप जलाकर मां लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है, उसी तरह अगली सुबह सूप पीटकर घर की नकारात्मकता और दरिद्रता को बाहर विदा किया जाता है।इस परंपरा का उद्देश्य घर में सुख-शांति, खुशहाली और धन-धान्य बनाए रखने की कामना करना है। हालांकि, यह एक लोकपरंपरा है, इसे शास्त्रों में अनिवार्य पूजा-विधान या गरीबी दूर करने का वैज्ञानिक उपाय नहीं माना जाना चाहिए।
क्या है सूप पीटने की परंपरा का महत्व?
पुराने समय में बांस से बने सूप का इस्तेमाल अनाज साफ करने के लिए किया जाता था। इसकी मदद से अनाज से भूसी, धूल और अन्य अवांछित चीजों को अलग किया जाता था।इसी काम से जोड़कर सूप को शुद्धि और अनावश्यक चीजों को अलग करने का प्रतीक माना जाने लगा। लोकमान्यता के अनुसार, जिस तरह सूप अनाज से बेकार चीजों को अलग करता है, उसी तरह दिवाली की अगली सुबह इसे बजाकर घर से दरिद्रता और परेशानियों को बाहर निकालने का प्रतीकात्मक संदेश दिया जाता है।कई परिवार इस रस्म को पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं। उनके लिए यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि परिवार की सांस्कृतिक पहचान और पूर्वजों से मिली विरासत भी है।
दिवाली के अगले दिन कितने बजे निकालते हैं दरिद्रता?
क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार, सूप पीटने की रस्म दिवाली के अगले दिन सुबह सूर्योदय से पहले निभाई जाती है। कई स्थानों पर इसे ब्रह्म मुहूर्त के आसपास करने की परंपरा है।
कुछ गांवों में परिवार की महिलाएं सुबह लगभग 3:30 से 4 बजे के बीच उठकर यह रस्म निभाती हैं। हालांकि, इसका कोई एक सर्वमान्य शास्त्रीय मुहूर्त निर्धारित नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसका समय अलग हो सकता है।
इस वर्ष दिवाली 8 नवंबर 2026, रविवार को मनाई जा रही है। इसलिए जिन परिवारों में यह परंपरा प्रचलित है, वे सोमवार, 9 नवंबर 2026 की सुबह इसे अपनी पारिवारिक रीति के अनुसार निभाएंगे।
इस परंपरा को निभाने का तरीका काफी अनोखा है। इसके लिए सामान्य तौर पर बांस का पुराना सूप और लकड़ी की डंडी का इस्तेमाल किया जाता है।
1. सुबह जल्दी उठें: दिवाली के अगले दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि कर लें। परिवार की स्थानीय परंपरा के अनुसार रस्म की शुरुआत करें।
2. पुराना सूप लें: इसके लिए बांस का पुराना या अनुपयोगी सूप लिया जाता है। साथ में लकड़ी की डंडी रख लें।
3. घर के कोने-कोने में घूमें: सूप को डंडी से पीटते हुए घर के अलग-अलग कमरों, आंगन और मुख्य दरवाजे तक जाएं।
4. पारंपरिक शब्द बोलें: इस दौरान कुछ स्थानों पर महिलाएं 'दरिद्र भाग जा, लक्ष्मी घर आ' और 'अलक्ष्मी दूर जा, लक्ष्मी घर आ' जैसे पारंपरिक वाक्य बोलती हैं।
5. सूप को घर से बाहर रखें: रस्म पूरी होने के बाद इस्तेमाल किए गए सूप को घर से बाहर रखने की परंपरा है। कुछ इलाकों में इसे गांव या बस्ती की सीमा के बाहर छोड़ दिया जाता है।
6. घर की सफाई करें: इसके बाद घर की साफ-सफाई की जाती है। कुछ परिवारों में गंगाजल का छिड़काव करने और मुख्य दरवाजे पर दीपक जलाने की भी परंपरा है।
कौन निभाता है दरिद्रता निकालने की परंपरा?
आमतौर पर इस रस्म को घर की महिलाएं या परिवार की बुजुर्ग सदस्य निभाती हैं। कुछ स्थानों पर परिवार के अन्य सदस्य भी इसमें शामिल होते हैं।ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा सामूहिक रूप से भी निभाई जाती है। सुबह-सुबह सूप की आवाज और पारंपरिक बोल के साथ घर से दरिद्रता को विदा करने की रस्म पूरी की जाती है।हालांकि, यह किसी एक व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं है। अलग-अलग परिवार अपनी मान्यता और रीति-रिवाज के अनुसार इसका पालन करते हैं।
क्या सूप पीटने से वास्तव में दूर होती है गरीबी?
धार्मिक मान्यताओं में सूप पीटने की रस्म को घर से दरिद्रता और नकारात्मकता दूर करने का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।लेकिन यह समझना जरूरी है कि केवल सूप पीटने से आर्थिक परेशानियां या गरीबी दूर होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यह मुख्य रूप से लोकविश्वास और पारंपरिक रीति-रिवाज से जुड़ी रस्म है।इस परंपरा का व्यापक संदेश यह माना जा सकता है कि दिवाली के बाद भी घर में स्वच्छता, सकारात्मकता, मेहनत और आपसी सद्भाव बनाए रखा जाए।
लक्ष्मी के स्वागत के साथ पुरानी परेशानियों को विदा करने का प्रतीकदिवाली की रात जहां दीप जलाकर मां लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है, वहीं अगली सुबह सूप पीटने की परंपरा घर से अभाव और नकारात्मकता को विदा करने की भावना से जुड़ी है।यह परंपरा बताती है कि भारतीय त्योहारों में धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकसंस्कृति और पारिवारिक परंपराओं का भी विशेष स्थान है।इसलिए अगर आपके परिवार में भी दिवाली के अगले दिन सूप पीटकर दरिद्रता निकालने की परंपरा है, तो आप इसे अपनी पारिवारिक मान्यता के अनुसार निभा सकते हैं। बस ध्यान रखें कि इसे अनिवार्य धार्मिक नियम या आर्थिक समृद्धि की गारंटी न समझें।
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