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धर्म-अध्यात्म
अमावस्या की रात ये छोटा सा उपाय माना जाता है बेहद शुभ जानें धार्मिक मान्यता
nidhi
10 Sept 2026 12:13 PM IST

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धर्म डेस्क: हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व माना गया है। भाद्रपद मास की अमावस्या को पिठोरी अमावस्या कहा जाता है। यह तिथि पितरों के तर्पण, दान-पुण्य के साथ संतान की सुख-समृद्धि और पारिवारिक कल्याण से भी जुड़ी है। धार्मिक मान्यताओं में अमावस्या पर मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा को भी शुभ माना गया है। इस बार अमावस्या तिथि 10 सितंबर 2026 को सुबह 10:33 बजे शुरू होकर 11 सितंबर को सुबह 8:56 बजे समाप्त हो रही है।
आधी रात को क्या करें?
लोकप्रिय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पिठोरी अमावस्या की रात घर के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में गाय के घी का दीपक जलाकर मां लक्ष्मी का स्मरण करना शुभ माना जाता है। घर में बरकत के लिए चौमुखा दीपक जलाने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि यह धार्मिक आस्था और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित उपाय है, इससे धन प्राप्ति की कोई वैज्ञानिक गारंटी नहीं है।
दीपक जलाते समय पूजा स्थान को साफ रखें और शांत मन से मां लक्ष्मी तथा भगवान विष्णु का ध्यान करें। सुरक्षा के लिए दीपक को ऐसी जगह रखें जहां आग लगने का खतरा न हो और उसे बिना निगरानी के न छोड़ें।
मुख्य द्वार पर भी जला सकते हैं दीपक
पिठोरी अमावस्या पर शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाने की परंपरा भी बताई गई है। धार्मिक मान्यता में इसे मां लक्ष्मी के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और तिल जैसी वस्तुओं का दान करना भी शुभ माना गया है।
पितरों के लिए करें तर्पण
पिठोरी अमावस्या केवल धन-समृद्धि से जुड़ी पूजा का दिन नहीं है। इसका प्रमुख धार्मिक महत्व पितरों के स्मरण और तर्पण से भी जुड़ा है। परंपरा के अनुसार जल में काले तिल और कुश डालकर पितरों का ध्यान करते हुए तर्पण किया जाता है। पितरों के नाम से दीपक जलाना और जरूरतमंद को भोजन कराना भी पुण्यकारी माना गया है।
64 योगिनियों की पूजा का महत्व
पिठोरी अमावस्या पर 64 योगिनियों और सप्त मातृकाओं की पूजा की परंपरा भी है। माताएं विशेष रूप से संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली की कामना से पिठोरी व्रत करती हैं। कई परंपराओं में आटे से 64 योगिनियों की आकृतियां बनाकर उनकी पूजा की जाती है।
पिठोरी अमावस्या पर पूजा-पाठ के साथ दान, बुजुर्गों का सम्मान और जरूरतमंदों की सहायता को विशेष महत्व दिया गया है। इसलिए केवल किसी एक उपाय को चमत्कारिक मानने के बजाय इस दिन का मूल भाव श्रद्धा, संयम, दान और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता माना जाता है।
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