धर्म-अध्यात्म

Ravana दहन पर शोक मनाते हैं ये लोग, खुद को बताते हैं दशानन का वंशज

Harrison
1 Oct 2025 9:41 PM IST
Ravana दहन पर शोक मनाते हैं ये लोग, खुद को बताते हैं दशानन का वंशज
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Religion Spirituality,धर्म अध्यात्म: जहां पूरे भारत में दशहरा के दिन रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, वहीं देश के कुछ हिस्सों में ऐसे भी समुदाय हैं जो इस दिन को शोक दिवस के रूप में मनाते हैं। इन लोगों का मानना है कि रावण सिर्फ एक राक्षस नहीं था, बल्कि वह एक महान पंडित, शिवभक्त और विद्वान राजा था — और वे खुद को उसका वंशज मानते हैं। यह मान्यता मुख्यतः मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के कुछ इलाकों में पाई जाती है, जहां हर साल दशहरा पर जब देशभर में रावण के पुतले जलाए जाते हैं, तब ये समुदाय रावण की पूजा करते हैं और दहन का विरोध करते हैं।
कौन हैं ये लोग?
इन समुदायों का दावा है कि वे रावण वंश से जुड़े हुए हैं और उन्हें "रावण राजवंशी" कहा जाता है।
गोंड जनजाति और कुछ दसपुरिया ब्राह्मणों का दावा है कि उनके पूर्वज लंका के राजा रावण से जुड़े थे।
ये लोग रावण को ब्राह्मण कुल का ज्ञानी, शिव का परम भक्त, वेदों का ज्ञाता और महान राजनीतिज्ञ मानते हैं।
कई इलाकों में लोग खुद को “दशानन का उत्तराधिकारी” कहते हैं और रावण को “मर्यादित राजा” की संज्ञा देते हैं।
इन लोगों के लिए दशहरा खुशियों का नहीं, बल्कि रावण के बलिदान और मृत्यु का दिन होता है। इसलिए वे इस दिन उपवास रखते हैं, प्रार्थना करते हैं और रावण की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीप जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
कहां-कहां होता है रावण की पूजा?
मंदसौर (मध्यप्रदेश): यहाँ रावण का एक भव्य मंदिर है। स्थानीय लोग मानते हैं कि मंदसौर रावण की पत्नी मंदोदरी की जन्मभूमि है। इसलिए यहाँ रावण को जमाई के रूप में पूजा जाता है।
कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश): यहां कुछ ब्राह्मण समुदाय रावण को शिवभक्त और ज्ञानी ब्राह्मण मानते हैं और दशहरा पर उसे श्रद्धांजलि देते हैं।
कर्नाटक के कोलार जिले में: यहां के कुछ ग्रामीण दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन नहीं करते, बल्कि वे उसके चरित्र और विद्वता की चर्चा करते हैं।
आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में: रावण को एक साहसी राजा के रूप में देखा जाता है। वहाँ उसके गुणों की व्याख्या करते हुए कविता और लोकगीत गाए जाते हैं।
क्या कहते हैं मान्यताएं?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, रावण एक महापंडित था। वह शिव का परम भक्त था और उसे "शिवतांडव स्तोत्र" का रचयिता भी माना जाता है।
हालांकि रावण ने सीता हरण जैसी बड़ी गलती की, लेकिन कई विद्वान उसे पूरी तरह से राक्षस कहना उचित नहीं मानते।
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि रावण का दहन एक पक्षीय निर्णय का प्रतीक है और उसमें रावण के गुणों की उपेक्षा की गई है।
विरोध के स्वर : हर साल कई स्थानों पर ऐसे समुदाय रावण दहन का विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि रावण को सिर्फ खलनायक के रूप में दिखाना इतिहास और परंपरा के साथ अन्याय है।
“हम रावण को जलाकर नहीं, उसे स्मरण करके सम्मान देना चाहते हैं। वह हमारे पूर्वज हैं, एक ज्ञानी और योग्य राजा थे।” — एक स्थानीय रावण भक्त का बयान।
रावण का चरित्र भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं में जटिल और बहुआयामी है। जहां एक ओर वह रामायण का खलनायक है, वहीं दूसरी ओर वह विद्या, भक्ति और शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है। जो समुदाय खुद को रावण का वंशज मानते हैं, उनके लिए दशहरा कोई उत्सव नहीं, बल्कि श्रद्धांजलि का दिन है। यह भारत की विचारों की विविधता और धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाता है, जहाँ एक ही कथा को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है।
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