धर्म-अध्यात्म

रिश्तों में सही समझ विकसित करने की सीख देते हैं गीता के ये 5 श्लोक

nidhi
15 Oct 2026 8:58 AM IST
रिश्तों में सही समझ विकसित करने की सीख देते हैं गीता के ये 5 श्लोक
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रिश्तों में उलझन हो तो समझें गीता की सीख

धर्म डेस्क: रिश्तों की मजबूती केवल अच्छे शब्दों से तय नहीं होती। विश्वास, सम्मान, संवेदनशीलता और व्यवहार की निरंतरता भी मायने रखती है। कई बार लगाव के कारण व्यक्ति सामने वाले की गलतियों को अनदेखा करता रहता है, जबकि कभी अपनी अपेक्षाओं के चलते संबंधों में तनाव बढ़ा लेता है। श्रीमद्भगवद्गीता में मन, आचरण, वाणी और विवेक से जुड़ी अनेक शिक्षाएं मिलती हैं। इनके आधार पर रिश्तों के प्रति अधिक संतुलित दृष्टि विकसित की जा सकती है।

यहां दिए गए पांच श्लोक मूल रूप से आध्यात्मिक साधना और सदाचरण से संबंधित हैं। रिश्तों से जोड़कर प्रस्तुत बातें उनकी व्यावहारिक व्याख्या हैं। इन्हें किसी व्यक्ति की नीयत पहचानने या धोखे से हमेशा बचने की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥” — अध्याय 12, श्लोक 13
इस श्लोक में द्वेष से मुक्त रहने, मित्रता, करुणा, अहंकार का त्याग, सुख-दुख में संतुलन और क्षमाशीलता जैसे गुणों का वर्णन है। रिश्तों के संदर्भ में इसकी सीख है कि अपनापन व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। कोई व्यक्ति आपकी परेशानी को समझता है या हर परिस्थिति में केवल अपनी सुविधा देखता है, इस अंतर पर ध्यान देना उपयोगी है। करुणा और सम्मान दोनों पक्षों के लिए जरूरी हैं। साथ ही, इन गुणों की अपेक्षा दूसरों से करने से पहले अपने आचरण को भी परखना चाहिए।
“ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥” — अध्याय 2, श्लोक 62
इसका भावार्थ है कि विषयों का निरंतर चिंतन आसक्ति पैदा करता है। आसक्ति से कामना और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है। रिश्तों पर लागू करें तो अत्यधिक लगाव और लगातार बढ़ती अपेक्षाएं मन की शांति प्रभावित कर सकती हैं। हर समय दूसरे व्यक्ति से अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार की उम्मीद रखना तनाव बढ़ा सकता है। प्रेम के साथ स्वतंत्रता और वास्तविकता को स्वीकार करना भी जरूरी है। किसी संबंध में निर्णय लेते समय केवल भावनाओं के बजाय सामने दिखाई दे रहे व्यवहार को महत्व देना इस सीख का व्यावहारिक उपयोग हो सकता है। “अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥” — अध्याय 17, श्लोक 15
इस श्लोक में उद्वेग पैदा न करने वाली, सत्य, प्रिय और हितकारी वाणी तथा स्वाध्याय के अभ्यास को वाणी का तप कहा गया है। रिश्तों में इसका अर्थ केवल मीठा बोलना नहीं है। बातचीत में सच्चाई और दूसरे के हित का ध्यान भी होना चाहिए। कोई बात सुनने में अच्छी लगे, लेकिन व्यवहार में बार-बार उससे उलट स्थिति मिले तो संवाद जरूरी है। इसी तरह अपनी असहमति रखते समय अपमानजनक शब्दों से बचना चाहिए। कठिन विषयों पर भी सम्मान के साथ बातचीत करना संबंधों को समझने और गलतफहमी दूर करने में मदद कर सकता है। gitasupersite.iitk.ac.in
“त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥” — अध्याय 16, श्लोक 21
गीता में काम, क्रोध और लोभ को आत्मविनाश की ओर ले जाने वाले तीन द्वार बताया गया है। रिश्तों के संदर्भ में इसकी व्यावहारिक सीख है कि अनियंत्रित इच्छाओं, गुस्से और स्वार्थ से सावधान रहें। यदि बातचीत बार-बार लालच, दबाव या क्रोध से संचालित हो रही है तो समस्या को अनदेखा करने के बजाय स्पष्टता लाना जरूरी है। यह सीख केवल दूसरे व्यक्ति का मूल्यांकन करने के लिए नहीं है। अपने भीतर के लोभ, अधिकार जताने की इच्छा और आवेश को पहचानना भी उतना ही आवश्यक है।
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥” — अध्याय 6, श्लोक 5
इसका मूल संदेश अपने प्रयास से स्वयं को ऊपर उठाना और पतन की ओर न जाने देना है। मनुष्य स्वयं अपना मित्र और स्वयं अपना शत्रु बन सकता है। रिश्तों से जोड़कर देखें तो अपनी समझ, मानसिक संतुलन और निर्णय क्षमता को विकसित करना महत्वपूर्ण है। किसी संबंध की परेशानी को अपनी पूरी पहचान बना लेना उचित नहीं। भावनात्मक कठिनाई में भरोसेमंद लोगों से बात करना, स्थिति को समय देकर समझना और अपने हितों पर विचार करना उपयोगी कदम हैं। आत्मविकास का अर्थ दूसरों से दूरी बनाना नहीं, बल्कि अधिक सजग होकर संबंध निभाना है।
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