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धर्म-अध्यात्म
जीवन में परेशानियां बढ़ा सकते हैं ये 5 ऋण, ऐसे चुकाएं
Tara Tandi
25 Sept 2026 6:49 PM IST

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ज्योतिष न्यूज़ : सनातन धर्म में मानव जीवन को केवल व्यक्तिगत कर्मों का परिणाम नहीं माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्म के साथ ही व्यक्ति पर अपने माता-पिता, पूर्वजों, देवी-देवताओं, ऋषियों और समाज के प्रति कुछ जिम्मेदारियां आ जाती हैं। इन्हीं दायित्वों को पांच ऋणों के रूप में बताया गया है। इन्हें मातृ ऋण, पितृ ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण और मनुष्य ऋण कहा जाता है। मान्यता है कि इन ऋणों को अपने कर्तव्यों और सद्कर्मों के माध्यम से निभाने से जीवन में संतुलन और सुख-शांति बनी रहती है।
1. मातृ ऋण
मातृ ऋण का संबंध मां और उनके मातृ पक्ष से माना जाता है। इसमें नाना-नानी, मामा-मामी, मौसा-मौसी तथा मातृ वंश के पूर्वजों को भी शामिल किया जाता है। मां को जीवनदात्री मानकर उनके प्रति सम्मान और सेवा करना इस ऋण को निभाने का प्रमुख माध्यम बताया गया है। माता को कष्ट न देना, उनकी जरूरतों का ध्यान रखना और मातृ पक्ष के प्रति सम्मान बनाए रखना इस ऋण को चुकाने का तरीका माना जाता है।
2. पितृ ऋण
पितृ ऋण में पिता के साथ दादा-दादी, ताऊ-चाचा और पूर्वजों की पीढ़ियों को शामिल किया जाता है। श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और पूर्वजों का स्मरण इसके प्रमुख धार्मिक उपाय माने गए हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ, हवन तथा गया जी में पिंडदान करने की भी परंपरा है। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखना और परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाना इस ऋण को निभाने का माध्यम माना जाता है।
3. देव ऋण
देव ऋण देवी-देवताओं और कुल देवता के प्रति कर्तव्य से जुड़ा माना जाता है। नियमित पूजा, इष्ट देव का स्मरण, कुल देवता की आराधना और धार्मिक आचरण के जरिए इस ऋण को निभाने की मान्यता है। माता-पिता की सेवा को भी धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण माना गया है।
4. ऋषि ऋण
ऋषि ऋण उन ऋषियों और गुरु परंपरा के प्रति कृतज्ञता से जुड़ा है, जिनसे ज्ञान और संस्कारों की परंपरा आगे बढ़ी। अपने गोत्र और ऋषि परंपरा का स्मरण, ज्ञान का सम्मान करना, उसे आगे पहुंचाना तथा ऋषि तर्पण करना इस ऋण को चुकाने के उपाय माने जाते हैं।
5. मनुष्य ऋण
मनुष्य ऋण का संबंध समाज और उन लोगों के प्रति कृतज्ञता से है, जिनसे जीवन में सहयोग मिला। जरूरतमंदों की सहायता करना, किसी के अधिकार का हनन न करना, दया और संवेदना रखना तथा पशु-पक्षियों और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाना इस ऋण को चुकाने का माध्यम माना जाता है। इस तरह सेवा, सहयोग और सद्भाव के जरिए मनुष्य अपने सामाजिक दायित्वों को पूरा करता है।
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