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धर्म-अध्यात्म
Rajasthan के इस जिले में मौजूद है 2000 साल पुराना चमत्कारी शिव मंदिर
Tara Tandi
19 April 2025 1:43 PM IST

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Shiva Temple राजस्थान न्यूज़ : भीलवाड़ा जिले में स्थित तिलस्वां महादेव राजस्थान के प्रमुख शिव मंदिरों में से एक है। यह मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं और विशेषताओं के लिए जाना जाता है। यहां भगवान शिव का शिवलिंग तिल के समान है। यह शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बना है और इसकी संरचना तिल के बीज जैसी है। शिवलिंग के साथ ही भगवान शिव की मूर्ति भी उसी स्थान पर विराजमान है। यहां स्थित तालाब में स्नान करने से भक्तों के चर्म रोग दूर होते हैं। इसी वजह से यहां साल भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है।
महाशिवरात्रि के पर्व पर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। तिलस्वां महादेव मंदिर के पुजारी घनश्याम पाराशर ने बताया कि यहां तिलस्वां महादेव नाम से प्राचीन शिव मंदिर है। यह 2024 साल पुराना मंदिर है। तिलस्वां महादेव मंदिर की स्थापना राजा हवन ने 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच यानी 2024 साल पहले की थी। राजा हवन ने ऊपर माल क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध बिजौलिया क्षेत्र में 12 मंदाकिनी का निर्माण कराया था, जिसमें से तिलस्वां महादेव शिव मंदिर मुख्य मंदाकिनी के नाम से प्रसिद्ध है। भगवान भोलेनाथ कुष्ठ रोग जैसे रोगों से पीड़ित भक्तों का कष्ट दूर करते हैं, जबकि मंदिर की पूजा का कार्य पाराशर परिवार द्वारा 16 पीढ़ियों से किया जा रहा है।
तिल के दाने जितना छोटा है शिवलिंग
तिलस्वां महादेव मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग है, जो तिल के दाने जितना छोटा है। शिवलिंग तिल के दाने जितना बड़ा होने के कारण इस स्थान का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। 'तिलस्वां' नाम के पीछे एक लोककथा भी है। मान्यता है कि एक बार मेनाल के राजा हवन को कुष्ठ रोग हो गया तो एक सिद्ध योगी ने उन्हें बिजौलिया स्थित मंदाकिनी महादेव के तालाब में स्नान करने का आदेश दिया। जिससे पूरे शरीर का कोढ़ तो ठीक हो गया, लेकिन केवल 'तिल' का कोढ़ ही रह गया। इस पर योगी ने राजा को आदेश दिया कि वे यहां से थोड़ी दूर दक्षिण दिशा में स्थित जल के तालाब में स्नान करें और वहां स्थापित शिवलिंग की पूजा करें। ऐसा करने से 'तिल' का कोढ़ ठीक हो गया। तभी से इसका नाम 'तिलस्वां' प्रसिद्ध हो गया और राजा ने यहां विशाल शिव मंदिर बनवाया।
तालाब में नहाने से दूर होते हैं चर्म रोग
मंदिर के पुजारी घनश्याम ने यह भी बताया कि यहां मान्यता है कि मंदिर परिसर में बने तालाब में नहाने और यहां की मिट्टी लगाने से शरीर के चर्म रोग दूर होते हैं, इसी के चलते यहां पूरे साल प्रदेश भर से लोग चर्म रोगों से मुक्ति पाने के लिए आते हैं।
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