धर्म-अध्यात्म

King इंद्रद्युम से जुड़ी है रथ यात्रा की शुरुआत की कथा

Ratna Netam
10 July 2026 4:21 PM IST
King  इंद्रद्युम से जुड़ी है रथ यात्रा की शुरुआत की कथा
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Puri पुरी : भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी आस्था, परंपरा और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु ओडिशा के पुरी पहुंचते हैं और भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के विशाल रथों को खींचकर पुण्य प्राप्ति की कामना करते हैं।

इस वर्ष महाप्रभु जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होगी और 24 जुलाई तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न होगी। इस दौरान पुरी नगरी भक्ति, उत्साह और आध्यात्मिक माहौल से भर जाती है।

हजारों साल पुरानी मानी जाती है परंपरा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की शुरुआत लगभग 5 हजार वर्ष पहले मानी जाती है। इस परंपरा का उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। स्कंद पुराण के उत्कल खंड में भी जगन्नाथ यात्रा का विस्तृत वर्णन किया गया है।

मान्यता है कि इस यात्रा की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से हुई थी। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ द्वारका से पुरी आए थे। इसी घटना की स्मृति में रथ यात्रा की परंपरा शुरू हुई।

राजा इंद्रद्युम की भक्ति से जुड़ी कथा

जगन्नाथ मंदिर और रथ यात्रा से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा मालव देश के राजा इंद्रद्युम से जुड़ी हुई है। राजा इंद्रद्युम भगवान विष्णु के परम भक्त थे और वे भगवान के दर्शन करना चाहते थे।

कहा जाता है कि वे नीलांचल पर्वत पहुंचे, लेकिन उन्हें भगवान के दर्शन नहीं हो सके। इससे निराश होकर जब वे वापस लौट रहे थे, तब उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि भगवान जल्द ही धरती पर प्रकट होंगे। इसके बाद राजा इंद्रद्युम ने भगवान की प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिया।

समुद्र से मिली दिव्य लकड़ी

मान्यता के अनुसार, एक दिन राजा इंद्रद्युम पुरी के समुद्र तट पर घूम रहे थे। तभी उन्हें समुद्र में दो विशाल लकड़ी के टुकड़े दिखाई दिए। उन्हें आकाशवाणी की बात याद आई और उन्होंने समझ लिया कि यही लकड़ी भगवान की मूर्ति बनाने के लिए है।

राजा के आदेश पर उन लकड़ियों को समुद्र से बाहर लाया गया और भगवान की प्रतिमा बनाने की तैयारी शुरू हुई।

विश्वकर्मा ने बनाया दिव्य स्वरूप

धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान की इच्छा से देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक बढ़ई के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने राजा इंद्रद्युम के सामने शर्त रखी कि वह मूर्तियों का निर्माण एकांत में करेंगे और जब तक काम पूरा न हो जाए, कोई भी अंदर प्रवेश नहीं करेगा।

राजा ने उनकी शर्त स्वीकार कर ली। इसके बाद विश्वकर्मा ने पुरी के गुण्डिचा मंदिर के पास मूर्ति निर्माण का कार्य शुरू किया।

अधूरी मूर्तियों की कहानी

कहा जाता है कि कई दिनों तक जब राजा को मूर्तियों के निर्माण की जानकारी नहीं मिली तो वे अधीर हो गए। उन्होंने शर्त तोड़ते हुए कार्यशाला में प्रवेश कर लिया। राजा को देखते ही विश्वकर्मा वहां से अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियां अधूरी रह गईं।

इसके बाद आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी अधूरे स्वरूप में पूजे जाना चाहते हैं। राजा इंद्रद्युम ने इन्हीं अधूरी मूर्तियों को दिव्य स्वरूप मानकर विशाल मंदिर का निर्माण कराया और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा सुभद्रा की स्थापना की।

आज भी भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां इसी विशेष स्वरूप में विराजमान हैं। रथ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन कर अपनी आस्था प्रकट करते हैं और इस ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा बनते हैं।

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