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Lanka में छिपा है शक्ति का रहस्य: यहां स्थापित है मां सती का पायल शक्तिपीठ

Tara Tandi
14 Jun 2025 3:39 PM IST
Lanka में छिपा है शक्ति का रहस्य: यहां स्थापित है मां सती का पायल शक्तिपीठ
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Maa Sati ज्योतिष न्यूज़: मां दुर्गा से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, वहीं कई मंदिरों और शक्तिपीठों का इतिहास कुछ और ही बयां करता है। मां के शक्तिपीठ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मौजूद हैं, जिनका अपना एक अलग स्थान है। हम बात कर रहे हैं मां दुर्गा के एक ऐसे शक्तिपीठ की जहां मां सती की पायल गिरी थी और भगवान श्रीराम ने भी इसी स्थान पर पूजा की थी। दुनिया के इस कोने में कैसे स्थित है यह मंदिर और क्या है इसकी खासियत, आइए जानते हैं...
श्रीलंका में स्थित है यह शक्तिपीठ
यहां बात करें तो मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में शामिल यह खास शक्तिपीठ श्रीलंका के जाफना के नल्लूर में स्थित बताया जाता है जहां मां सती की पायल गिरी थी, इसके बाद से इस पवित्र स्थान को मां का खास शक्तिपीठ यानी इंद्राक्षी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है। इस शक्तिपीठ के बारे में यह भी कहा जाता है कि, श्रीलंका के जाफना में सती की पायल यानी घुंघरू गिरे थे और इसी स्थान पर इंद्राक्षी या शंकरी शक्तिपीठ की स्थापना हुई। इतना ही नहीं, यहां की शक्ति को मां इंद्राक्षी, शंकरी और नागपुष्नी अम्मा के नाम से जाना जाता है और शिव या भैरव को राक्षसेश्वर या नयनार कहा जाता है, जो रक्ष कुल यानी राक्षसों के देवता हैं।
भगवान श्री राम ने की है पूजा
कहते हैं कि, त्रेता युग में भगवान श्री राम ने इस शक्तिपीठ में देवी दुर्गा की पूजा की थी। भगवान शिव के भक्त कहे जाने वाले रावण ने भी युद्ध से पहले इस शक्तिपीठ में पूजा की थी। ऐसा कहा जाता है कि देवी दुर्गा के शक्तिपीठ दुनिया में कई जगहों पर स्थित हैं, जिनमें से नेपाल में दो शक्तिपीठ हैं, पहला गुह्येश्वरी शक्तिपीठ और दूसरा दंतकाली शक्तिपीठ है। पाकिस्तान में एक हिंगलाज शक्तिपीठ है। बांग्लादेश में चार शक्तिपीठ हैं। इनमें सुगंधा शक्तिपीठ, करतोयाघाट शक्तिपीठ, चट्टल शक्तिपीठ, यशोर शक्तिपीठ के नाम सामने आते हैं।
जानिए शक्तिपीठ की पौराणिक कथा
यहां आपको बता दें कि शक्तिपीठ के निर्माण की पौराणिक कथा भी काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि माता सती के पिता दक्ष प्रजापति ने कनखल नामक स्थान पर एक महायज्ञ किया था जिसे हरिद्वार के नाम से जाना जाता है। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र समेत सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था लेकिन भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। माता सती को इस बात का पता चला। वह अपने पति को यज्ञ में आमंत्रित न करने का उत्तर जानने के लिए अपने पिता दक्ष के पास गईं। जब माता सती ने यह सवाल अपने पिता से पूछा तो उन्होंने भगवान शिव के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर उनका अपमान किया।
अपमान से क्रोधित होकर माता सती ने उसी यज्ञ के अग्नि कुंड में अपने प्राण त्याग दिए। जब ​​भगवान शिव को इस बात का पता चला तो वे क्रोधित हो गए और उनकी तीसरी आंख खुल गई, उन्होंने माता सती के शरीर को उठाकर अपने कंधे पर रख लिया। भगवान शिव का तांडव जारी रहा, वे कैलाश की ओर मुड़े, धरती पर प्रलय का खतरा बढ़ता देख भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को टुकड़े-टुकड़े करना शुरू कर दिया। इस तरह उनके शरीर के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग जगहों पर गिरे। ऐसा 51 बार हुआ, इस तरह 51 शक्तिपीठ स्थापित हुए।
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