धर्म-अध्यात्म

गंगा को ‘विष्णुपदी’ कहे जाने के पीछे पौराणिक कथा, विष्णु पुराण और भागवत में उल्लेख

Kavita2
23 May 2026 11:43 AM IST
गंगा को ‘विष्णुपदी’ कहे जाने के पीछे पौराणिक कथा, विष्णु पुराण और भागवत में उल्लेख
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Religion Desk धर्म डेस्क : सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथों विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत के अनुसार मां गंगा को केवल भगवान शिव की जटाओं से जुड़ी नदी ही नहीं, बल्कि सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न दिव्य धारा भी माना गया है। इसी कारण गंगा को ‘विष्णुपदी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है भगवान विष्णु के चरणों से निकली पवित्र नदी।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा नदी का उद्गम अत्यंत दिव्य और रहस्यमय घटनाओं से जुड़ा हुआ है। एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, प्राचीन कथाओं में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है, जो गंगा को सृष्टि की सबसे पवित्र नदियों में स्थान देता है।

कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया था, तब उन्होंने तीन पगों में संपूर्ण ब्रह्मांड को नाप लिया था। उनके प्रथम दो पगों से पृथ्वी और आकाश लोक मापे गए, जबकि तीसरा पग जब उन्होंने आगे बढ़ाया, तो ब्रह्मांड का ऊपरी आवरण (ब्रह्मांडीय कवच) उनके बाएं पैर के अंगूठे के नाखून के स्पर्श से फट गया।

उस क्षण उस दिव्य स्थान से एक पवित्र जलधारा प्रकट हुई, जो सीधे भगवान विष्णु के चरणों को स्पर्श करते हुए प्रवाहित होने लगी। यह जलधारा अत्यंत पावन और दिव्य मानी गई, जिसे आगे चलकर गंगा नदी के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होने का आधार माना जाता है।

शास्त्रों के अनुसार, यही कारण है कि गंगा को केवल पृथ्वी की नदी नहीं बल्कि स्वर्ग और विष्णु लोक से जुड़ी दिव्य धारा माना जाता है। इसीलिए उन्हें ‘पतित-पावनी’ कहा जाता है, अर्थात जो सभी पापों का नाश कर देती हैं और आत्मा को शुद्ध करती हैं।

धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि गंगा का जल केवल भौतिक रूप से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत शुद्ध और मोक्ष प्रदान करने वाला है। गंगा स्नान और उनके जल का स्पर्श करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।

गंगा को ‘विष्णुपदी’ कहे जाने की यह कथा भारतीय संस्कृति में आस्था, भक्ति और ब्रह्मांडीय विश्वास का प्रतीक मानी जाती है। यह केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि सनातन परंपरा में सृष्टि, ईश्वर और प्रकृति के गहरे संबंध को दर्शाने वाली एक आध्यात्मिक अवधारणा भी है।

कुल मिलाकर, विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत में वर्णित यह प्रसंग गंगा नदी को एक दिव्य स्वरूप प्रदान करता है, जो उन्हें केवल एक नदी नहीं बल्कि साक्षात देवी के रूप में स्थापित करता है।

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