धर्म-अध्यात्म

ज्वाला देवी के दरबार में नौ अखंड ज्योतियों का रहस्य आज भी बना कौतूहल

nidhi
24 Aug 2026 11:00 AM IST
ज्वाला देवी के दरबार में नौ अखंड ज्योतियों का रहस्य आज भी बना कौतूहल
x
हिमाचल का चमत्कारी शक्तिपीठ

कांगड़ा: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वाला देवी मंदिर देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां चट्टानों से निकलने वाली प्राकृतिक ज्वालाएं हैं। मंदिर में देवी की पारंपरिक प्रतिमा के बजाय इन्हीं ज्योतियों को शक्ति स्वरूप मानकर पूजा जाता है। सदियों से लगातार दिखाई देने वाली इन ज्वालाओं के कारण यह मंदिर आस्था के साथ रहस्य और जिज्ञासा का भी केंद्र बना हुआ है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्वाला देवी मंदिर उन शक्तिपीठों में शामिल है, जिनका संबंध माता सती की कथा से जोड़ा जाता है। पौराणिक कथा है कि राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती ने स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया था। इसके बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे। भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे और ये स्थान शक्तिपीठ कहलाए। मान्यता है कि यहां माता सती की जिह्वा गिरी थी।
मंदिर की सबसे चर्चित विशेषता इसकी प्राकृतिक ज्योतियां हैं। मान्यता के अनुसार यहां नौ ज्वालाओं को देवी के अलग-अलग स्वरूपों से जोड़कर पूजा जाता है। इन्हें महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजी देवी के स्वरूप से जोड़ने की परंपरा प्रचलित है।
इन ज्वालाओं में किसी सामान्य दीपक की तरह तेल या बाती डालकर लौ नहीं जलाई जाती। वे चट्टानों में मौजूद दरारों से निकलती गैस के कारण जलती दिखाई देती हैं। भूवैज्ञानिक दृष्टि से ऐसी प्राकृतिक ज्वालाओं को भूमिगत ज्वलनशील गैसों के रिसाव से जोड़ा जाता है। श्रद्धालुओं के लिए, हालांकि, ये लौ माता ज्वाला के दिव्य स्वरूप और चमत्कार का प्रतीक हैं।
मंदिर से मुगल सम्राट अकबर की एक बेहद लोकप्रिय कथा भी जुड़ी हुई है। जनश्रुति के अनुसार अकबर को जब यहां बिना तेल-बाती के लगातार जलने वाली ज्योतियों के बारे में पता चला तो उसने उनकी सत्यता परखने का प्रयास किया। कहा जाता है कि ज्वालाओं को बुझाने के कई प्रयास किए गए, लेकिन वे नहीं बुझीं।
लोककथा में यह भी कहा जाता है कि अकबर ने ज्वालाओं को बुझाने के लिए पानी की व्यवस्था करवाई, लेकिन प्रयास सफल नहीं हुआ। इसके बाद सम्राट को देवी की शक्ति का अहसास हुआ और उसने मंदिर में सोने का छत्र चढ़ाने की पेशकश की। इसी कथा का एक और दिलचस्प हिस्सा मंदिर में आज भी सुनाया जाता है। मान्यता है कि देवी ने अकबर का स्वर्ण छत्र स्वीकार नहीं किया और उसका स्वरूप किसी दूसरी धातु जैसा हो गया। मंदिर परिसर में एक छत्र को इस घटना से जोड़कर दिखाया जाता है। हालांकि अकबर से जुड़ी इन घटनाओं के कई विवरण मुख्यतः धार्मिक परंपरा और जनश्रुतियों पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें प्रमाणित इतिहास से अलग समझना उचित है।
मंदिर में दर्शन के दौरान श्रद्धालुओं का सबसे ज्यादा ध्यान गर्भगृह में दिखाई देने वाली प्राकृतिक लौ पर रहता है। सामान्य देवी मंदिरों की तरह यहां किसी विशाल मूर्ति के दर्शन नहीं होते। धरती से निकलती ज्योतियों को ही माता का स्वरूप मानकर फूल, प्रसाद और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। नवरात्रि के दौरान ज्वाला देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। हिमाचल प्रदेश के अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे हिस्सों से बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं। ज्वालामुखी शहर में स्थित होने के कारण मंदिर तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
ज्वाला देवी मंदिर धार्मिक पर्यटन के लिहाज से भी हिमाचल प्रदेश के प्रमुख स्थलों में शामिल है। कांगड़ा क्षेत्र में स्थित होने के कारण श्रद्धालु अपनी यात्रा में ब्रजेश्वरी देवी, चामुंडा देवी और चिंतपूर्णी जैसे दूसरे प्रसिद्ध शक्ति स्थलों को भी शामिल करते हैं। सदियों से जलती प्राकृतिक ज्वालाएं इस मंदिर को भारत के दूसरे शक्तिपीठों से अलग पहचान देती हैं। विज्ञान इन्हें प्राकृतिक गैस के रिसाव से जोड़कर देखता है, जबकि करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए ये माता की शक्ति का जीवंत स्वरूप हैं। यही आस्था, पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक जनश्रुतियां ज्वाला देवी मंदिर को देश के सबसे अनोखे धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं।
Next Story