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धर्म-अध्यात्म
गीता के दो श्लोकों में शांति का संदेश, श्रीकृष्ण ने बताया मोह से मुक्ति का मार्ग
nidhi
17 Oct 2026 8:09 AM IST

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मन को क्यों नहीं मिलती शांति?
धर्म डेस्क: जीवन में सुख-सुविधाएं बढ़ने के बावजूद मन हमेशा शांत रहे, यह जरूरी नहीं। कोई सफलता मिलने के बाद अगली उपलब्धि की चिंता शुरू हो जाती है। रिश्तों में अपनापन होते हुए भी अपेक्षाएं दुख दे सकती हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को मन की स्थिरता, आसक्ति और आत्मबोध का महत्व समझाते हैं। दूसरे अध्याय के श्लोक 71 और 72 में इच्छाओं, ममता और अहंकार से ऊपर उठकर शांति पाने का संदेश मिलता है। इन शिक्षाओं का व्यावहारिक अर्थ अपने व्यवहार और सोच को पहचानते हुए जीवन में संतुलन विकसित करना है।
पहला श्लोक: इच्छाओं के बंधन से ऊपर उठने की सीख
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥
— अध्याय 2, श्लोक 71
इसका सरल भावार्थ है कि जो व्यक्ति कामनाओं का त्याग करके स्पृहारहित जीवन जीता है और ममता तथा अहंकार से मुक्त होता है, वह शांति प्राप्त करता है। यहां ‘निर्मम’ का संबंध ‘मेरा’ होने की आसक्ति से और ‘निरहंकार’ का संबंध अहंभाव से मुक्ति से है। श्लोक मन की उस स्थिति की ओर संकेत करता है, जिसमें व्यक्ति की शांति लगातार किसी वस्तु या उपलब्धि पर निर्भर नहीं रहती।
रोजमर्रा के जीवन में इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। कोई विद्यार्थी मेहनत से परीक्षा की तैयारी करता है। अच्छा परिणाम उसकी इच्छा है, लेकिन यदि वह अपनी पूरी पहचान केवल अंकों से जोड़ दे, तो अपेक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं मिलने पर टूट सकता है। इस शिक्षा का व्यावहारिक उपयोग यह होगा कि वह तैयारी ईमानदारी से करे, अपनी कमियों को सुधारे और परिणाम को अपने संपूर्ण मूल्य का प्रमाण न बनाए।
इसी तरह रिश्तों में ‘मेरा’ का भाव कभी-कभी नियंत्रण की इच्छा में बदल जाता है। सामने वाला हमेशा हमारी पसंद के अनुसार बोले या व्यवहार करे, ऐसी अपेक्षा तनाव बढ़ा सकती है। इस श्लोक से प्रेरणा लेते हुए अपनापन बनाए रखते हुए दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करना सीखा जा सकता है। यह आधुनिक जीवन का उदाहरण है, श्लोक का शब्दशः अनुवाद नहीं।
अहंकार को पहचानना भी महत्वपूर्ण है। सफलता मिलने पर सारा श्रेय स्वयं लेना और गलती होने पर दूसरों को जिम्मेदार ठहराना आत्मचिंतन में बाधा बन सकता है। विनम्रता का अभ्यास अपनी योग्यता को नकारना नहीं है। इसका अर्थ अपनी सीमाएं स्वीकार करना, सहयोग का सम्मान करना और सीखने के लिए तैयार रहना भी हो सकता है।
दूसरा श्लोक: स्थिर आत्मबोध और मोह से मुक्ति
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥
— अध्याय 2, श्लोक 72
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त करके व्यक्ति मोहग्रस्त नहीं होता और अंतकाल में भी इस स्थिति में स्थापित रहकर ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करता है। ब्राह्मी स्थिति का आशय ब्रह्म में प्रतिष्ठित आध्यात्मिक अवस्था से है। ब्रह्मनिर्वाण मुक्ति का आध्यात्मिक विचार है; इसे केवल कुछ समय के मानसिक आराम तक सीमित करके समझना पर्याप्त नहीं होगा।
इन दोनों श्लोकों को साथ पढ़ने पर एक क्रम दिखाई देता है। पहले इच्छाओं, ममता और अहंकार के बंधन से मुक्त होने की बात आती है। इसके बाद उस स्थिर आध्यात्मिक अवस्था का वर्णन है, जिसमें मोह व्यक्ति को विचलित नहीं करता। अलग-अलग दार्शनिक परंपराएं इन पदों की विस्तृत व्याख्या करती हैं, इसलिए सरल भावार्थ को पूरी दार्शनिक व्याख्या का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
व्यवहार में शुरुआत छोटे आत्मचिंतन से की जा सकती है। किसी बात पर गुस्सा आने पर स्वयं से पूछें कि परेशानी वास्तविक नुकसान से है या अपनी अपेक्षा पूरी नहीं होने से। प्रशंसा मिलने पर प्रसन्न हों, लेकिन उसकी लगातार जरूरत को पहचानें। आलोचना सुनते समय देखें कि उसमें सुधार योग्य बात है या केवल असहमति। ऐसे प्रश्न अपनी प्रतिक्रियाओं को समझने में मदद कर सकते हैं।
दिन के अंत में कुछ मिनट अपने आचरण पर विचार करना भी उपयोगी अभ्यास हो सकता है। आज कहां अनावश्यक तुलना की, किस बात पर अधिकार जताया और कब गलती स्वीकार की—इन प्रश्नों के उत्तर लिखें। गीता के इन श्लोकों का अध्ययन केवल पाठ तक सीमित रखने के बजाय आत्मपरीक्षण का अवसर बन सकता है। उनकी आध्यात्मिक सीख मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों के साथ अपने भीतर की आसक्ति और अहंभाव को भी देखने का आमंत्रण देती है।
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