धर्म-अध्यात्म

बसंत के मौसम की पौराणिक कथा, जाने

Bhumika Sahu
5 Feb 2022 5:26 AM GMT
बसंत के मौसम की पौराणिक कथा, जाने
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बसंत का मौसम बहुत सुहावना होता है. इसकी शुरुआत बसंत पंचमी से होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस ऋतु की उत्पत्ति कैसे हुई थी? अगर नहीं, तो यहां जानिए बसंत ऋतु से जुड़ी पौराणिक कथा.

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। बसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है. इसे भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) का पसंदीदा मौसम कहा जाता है. गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने स्वयं को ऋतुओं में बसंत बताया है. बसंत के मौसम में शीत ऋतु (Winter Season) समाप्त हो जाती है और सुहावना बसंत का मौसम आ जाता है. इस मौसम में प्रकृति भी काफी खुश नजर आती है और नए पत्तों, फूलों और कोपलों से अपना शृंगार करती है. बसंत ऋतु की शुरुआत माता सरस्वती (Mata Saraswati) के प्राकट्य दिवस बसंत पंचमी से होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बसंत ऋतु का इतिहास क्या है? धर्म ग्रंथों में इस मौसम को कामदेव से उत्पन्न मौसम माना गया है. इसलिए बसंत के मौसम को कामदेव का पुत्र कहा जाता है. यहां जानिए इसकी कथा.

बसंत के मौसम की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के हवन कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया था तो महादेव बहुत दुखी हुए थे और सती के वियोग में वो ध्यान में बैठ गए थे. उस समय तारकासुर ने ब्रह्मा जी की तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु सिर्फ शिव के पुत्र के हाथों से ही हो. वो जानता था कि शिव सती के वियोग में ध्यान में चले गए हैं. न तो उनका ध्यान भंग करना संभव है और न ही शिव का आसानी से दूसरा विवाह हो सकता है. ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दे दिया.
इस वरदान को पाकर वो बहुत ताकतवर हो गया. कोई चाहकर भी उसे मार नहीं सकता था. ऐसे में उसने देवताओं को भी परेशान करना शुरू कर दिया. इससे दुखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे, लेकिन वे भी तारकासुर को मारने में असमर्थ थे क्योंकि तारकासुर को ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त था. ऐसे में उन्होंने देवताओं को सुझाव दिया कि वे महादेव का तप किसी तरह भंग करवाएं और इसके लिए कामदेव की मदद लें.
तब कामदेव ने शिवजी का तप भंग करने के लिए बंसत ऋतु को उत्पन्न किया. इस ऋतु में ठंडी व सुहावनी हवाएं चलती हैं, पेड़ों में नए पत्ते आना शुरू हो जाते हैं, सरसों के खेत में पीले फूल दिखने लगते हैं, आम के पेड़ों पर बौर आ जाते हैं. बसंत ऋतु के मौसम में कामदेव ने शिव जी पर काम बाणों की वर्षा की. इससे शिवजी का ध्यान टूट गया और उन्हें क्रोध आ गया. क्रोध में उनका तीसरा नेत्र खुल गया, जिससे कामदेव भस्म हो गए. कुछ समय बाद जब महादेव का क्रोध शांत हुआ तब देवताओं ने उन्हें बताया कि कामदेव को ऐसा क्यों करना पड़ा. इसके बाद कामदेव की पत्नी रति ने महादेव से निवेदन किया कि किसी तरह वे कामदेव को जीवित करें.
तब शिवजी ने रति को वरदान दिया कि द्वापर युग में कामदेव श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेंगे. इसके कुछ समय बाद पार्वती की तपस्या से शिव प्रसन्न हुए और उनका विवाह माता पार्वती के साथ हो गया. शिव जी और माता पार्वती के पुत्र के रूप में कार्तिकेय ने जन्म लिया. बाद में कार्तिकेय ने ही तारकासुर का वध करके देवताओं को उसके आतंक से बचाया.


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