धर्म-अध्यात्म

नवरात्र का पांचवां दिन मां स्कंदमाता को समर्पित, जानें पूजा का मुहूर्त और मंत्र

nidhi
15 Oct 2026 11:08 AM IST
नवरात्र का पांचवां दिन मां स्कंदमाता को समर्पित, जानें पूजा का मुहूर्त और मंत्र
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नवरात्र की पंचमी पर करें मां स्कंदमाता की पूजा

धर्म डेस्क : शारदीय नवरात्र का पांचवां दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता को समर्पित है। इस वर्ष गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को देवी की आराधना की जा रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां स्कंदमाता की उपासना सुख-शांति, ज्ञान और परिवार के कल्याण की कामना से की जाती है। भक्त उन्हें ममता और करुणा का स्वरूप मानते हैं। कष्टों से मुक्ति और मनोकामनाओं की पूर्ति का विश्वास भी इस पूजा से जुड़ा है।

पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल पंचमी तिथि 16 अक्टूबर की सुबह 3 बजकर 25 मिनट तक रहेगी। इसके बाद षष्ठी तिथि शुरू होगी। 15 अक्टूबर के प्रकाशित पंचांग में अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 44 मिनट से 12 बजकर 30 मिनट तक बताया गया है। अमृत काल रात 8 बजकर 59 मिनट से 10 बजकर 46 मिनट तक है। ये समय स्थानीय सूर्योदय और स्थान के अनुसार अलग हो सकते हैं, इसलिए पूजा का समय अपने शहर के पंचांग से मिलाएं।
उसी पंचांग में राहुकाल दोपहर 1 बजकर 33 मिनट से 2 बजकर 59 मिनट तक दिया गया है। वहीं, शाम को पूजा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रकाशित चौघड़िया में शाम 5 बजकर 52 मिनट से 7 बजकर 25 मिनट तक अमृत का समय बताया गया है। नित्य पूजा और परिवार की परंपरा के अनुसार देवी की आराधना की जा सकती है।
मां स्कंदमाता का स्वरूप मातृत्व का प्रतीक माना जाता है। देवी की चार भुजाएं हैं और उनकी गोद में बालरूप भगवान स्कंद विराजमान रहते हैं। स्कंद को कार्तिकेय और मुरुगन नामों से भी जाना जाता है। देवी के दो हाथों में कमल के फूल दिखाए जाते हैं, जबकि एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में रहता है। उनका वाहन सिंह है। कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण उन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। माँ स्कन्दमाता
पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर के वध के लिए भगवान शिव के पुत्र स्कंद का जन्म हुआ था। कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने। भगवान स्कंद की माता के रूप में देवी पार्वती स्कंदमाता नाम से पूजी गईं। उनकी गोद में विराजमान बालक स्कंद का स्वरूप इसी मातृभाव को दर्शाता है। परंपरा में माना जाता है कि स्कंदमाता की आराधना से भगवान कार्तिकेय की कृपा भी प्राप्त होती है। भक्त विशेष रूप से संतान के कल्याण और परिवार की रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
पूजा के लिए स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करें। मां स्कंदमाता की तस्वीर या प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर आराधना का संकल्प लें। देवी को जल, चंदन, अक्षत, पुष्प और धूप अर्पित करें। इसके बाद माता का ध्यान करते हुए मंत्र जपें। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जा सकता है। अंत में आरती कर परिवार की सुख-शांति की कामना करें।
मां स्कंदमाता का प्रचलित नाम मंत्र है—
ॐ देवी स्कन्दमात्रे नमः॥
पूजा के दौरान देवी की यह प्रार्थना भी की जाती है—
सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
इस प्रार्थना में सिंह पर विराजमान, कमल धारण करने वाली यशस्विनी मां स्कंदमाता से मंगल प्रदान करने की कामना की गई है। माँ स्कन्दमाता
मंत्र का जाप शांत मन से देवी के स्वरूप का ध्यान करते हुए करें। परंपरा में नाम मंत्र की एक माला, यानी 108 बार जाप करने का विधान भी प्रचलित है। पूजा के बाद आरती करके प्रसाद बांटा जाता है। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में पूजन की विधि में अंतर हो सकता है।
मां स्कंदमाता को केले का भोग अर्पित करने की परंपरा है। इसके अलावा खीर, दूध से बनी मिठाई और अन्य सात्विक पकवान भी अर्पित किए जा सकते हैं। भोग तैयार करते समय स्वच्छता का ध्यान रखें और पूजा के बाद प्रसाद परिवार के सदस्यों में बांटें। धार्मिक मान्यताओं में देवी का यह स्वरूप प्रेम, धैर्य और साहस से जुड़ा है। श्रद्धालु पंचमी पर इन्हीं भावों के साथ मां की उपासना करते हैं।

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