धर्म-अध्यात्म

एक ऐसा महायज्ञ, जिससे खतरे में पड़ गया था सांपों का अस्तित्व, पौराणिक कथाओं में भी है इसका जिक्र

Gulabi
15 May 2021 8:44 AM GMT
एक ऐसा महायज्ञ, जिससे खतरे में पड़ गया था सांपों का अस्तित्व, पौराणिक कथाओं में भी है इसका जिक्र
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हमारे पौराणिक मान्यताओं में एक से बढ़कर एक कथाओं का जिक्र है

हमारे पौराणिक मान्यताओं में एक से बढ़कर एक कथाओं का जिक्र है. ऐसी ही एक दिलचस्प कहानी हम आपको बताते हैं. महाभारत के अनुसार परीक्षित अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे. जब परीक्षित हस्तिनापुर के राजा थे, तब वो आखेट के लिए वन में गए. जंगल में जानवरों के पीछे दौड़ने के कारण उन्हें प्यास लगी, तो वो पानी की तलाश में शमीक ऋषि के आश्रम में पहुंच गए. वहां उन्होने देखा कि शमीक ऋषि आंखें बंद किए हुए ध्यान में लीन हैं.


प्यास से व्याकुल राजा परीक्षित ने उनसे पानी मांगा. मगर ध्यान में होने के कारण शमीक ऋषि कुछ भी जवाब नहीं दे सके. इसपर परीक्षित को गुस्सा आ गया और उन्होंने पास पड़े एक मरे हुए सांप को ऋषि के गले में डाल दिया.

श्राप से हुई राजा परीक्षित की मृत्यु
शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी जब आश्रम पहुंचे, तो उन्होंने ध्यान में लीन अपने पिता के गले में लटक रहे मरे हुए सांप को देखा. उन्हें पता चला कि इसके पीछे राजा परीक्षित का हाथ है. नाराज होकर श्रृंगी ने राजा परीक्षित को श्राप दिया कि आज से ठीक सातवें दिन नागराज तक्षक के काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी.

बेटे ने लिया मौत का बदला लेने का संकल्प
श्रृंगी के श्राप के बाद राजा परीक्षित सांपों से खुद को दूर रखने की कोशिश करने लगे. मगर ठीक सातवें दिन फूलों की टोकरी में कीड़े के रूप में छुपकर आए तक्षक नाग ने राजा परीक्षित को काट लिया और उनकी मृत्यु हो गई. अब इस घटना की जानकारी राजा तक्षक के पूत्र जनमेजय को लगी. जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे. उन्होंने तक्षक नाग से बदला लेने का संकल्प ले लिया.

लाखों सांपों की आहुती
जनमेजय ने सर्फ मेध यज्ञ का अनुष्ठान किया. इस यज्ञ के कुंड में पृथ्वी के सारे सांप एक बाद एक आकर गिरने लगे. एक विशिष्ट मंत्र द्वारा नाग स्वयं यज्ञ के पास पहुंच जाते थे.लाखों सांपों की आहुती दे दी गई. सर्प जाति का अस्तिव खतरे में आ गया. इसे देखते हुए नागराज तक्षक सूर्यदेव के रथ से जाकर लिपट गए. इसकी वजह से सूर्यदेव का रथ हवन कुंड की तरफ बढ़ने लगा. अगर तक्षक नाग के साथ सूर्य देव हवन कुंड में समा जाते तो सृष्टि की गति थम जाती.

इसलिए देवताओं ने जनमेजय से आग्रह किया कि वो यज्ञ को बंद कर दें. मगर वो अपने पिता की मौत का बदला लेने पर तुले हुए थे. आखिर में अस्तिक मुनि के हस्तक्षेप से जनमेजय ने सांपों के महाविनाशक यज्ञ को रोका. तब जाकर तक्षक नाग की जान बच पाई थी.


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