धर्म-अध्यात्म

पितृ पक्ष में नारायणी शिला का विशेष महत्व

Ashish verma
5 Oct 2026 4:53 PM IST
पितृ पक्ष में नारायणी शिला का विशेष महत्व
x
हरिद्वार: पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आस्था प्रकट करने वाला पितृ पक्ष चल रहा है। इसके साथ ही हरिद्वार के प्रमुख तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने के लिए श्रद्धालुओं की हलचल तेज हो गई है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पितृ पक्ष के दिनों को पूर्वजों को याद करने और उनके निमित्त धार्मिक कर्म करने के लिए विशेष माना गया है। इन्हीं दिनों में हरिद्वार की प्राचीन नारायणी शिला पर भी बड़ी संख्या में
श्रद्धालु
अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा भाव से किए जाने वाले कर्म को श्राद्ध कहा जाता है। पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हुए तर्पण, पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान और श्रद्धा से किए गए इन कर्मों से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। यही वजह है कि पितृ पक्ष के दौरान देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
हरिद्वार को सनातन परंपरा में प्रमुख तीर्थों में गिना जाता है। यहां गंगा स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पूरे वर्ष श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन पितृ पक्ष के दौरान इसका महत्व और बढ़ जाता है। हरिद्वार की प्राचीन नारायणी शिला को पितृ कर्म के प्रमुख स्थलों में माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के कारण यहां श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं।
स्कंद पुराण, वायु पुराण और गरुड़ पुराण समेत विभिन्न धार्मिक ग्रंथों से जुड़ी मान्यताओं में नारायणी शिला का विशेष उल्लेख बताया जाता है। मान्यता है कि पितृ पक्ष में यहां श्रद्धापूर्वक श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से पूर्वजों को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी धार्मिक विश्वास के चलते पितृ पक्ष के दिनों में नारायणी शिला पर विशेष धार्मिक गतिविधियां देखने को मिलती हैं।
पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक माना जाता है। इस अवधि में अलग-अलग तिथियों पर पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। परिवार अपने दिवंगत सदस्यों को याद करते हुए धार्मिक परंपराओं के अनुसार तर्पण और पिंडदान करते हैं। पितृ पक्ष की अमावस्या का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
पितृ मुक्ति से जुड़े तीर्थों की बात की जाए तो गया, बद्रीनाथ और हरिद्वार का उल्लेख प्रमुख रूप से किया जाता है। हर स्थान से अलग-अलग पौराणिक
मान्यताएं
जुड़ी हुई हैं। हरिद्वार की नारायणी शिला को लेकर मान्यता है कि यहां भगवान विष्णु का विशेष संबंध स्थापित है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार गया में भगवान श्रीहरि के चरण और बद्रीनाथ में उनका ललाट माना गया है, जबकि हरिद्वार स्थित नारायणी शिला को भगवान विष्णु के कंठ से नाभि तक के पवित्र वक्ष स्थल से जोड़ा जाता है। इसी मान्यता के कारण नारायणी शिला को पितृ कर्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना गया है।
धार्मिक विश्वास है कि पितृ पक्ष के 16 दिनों के दौरान नारायणी शिला पर किया गया तर्पण और पिंडदान वैकुंठनाथ के हृदय तक पहुंचता है। श्रद्धालु इसी आस्था के साथ यहां पहुंचकर अपने पूर्वजों के लिए धार्मिक कर्म करते हैं। कई परिवार अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार पुरोहितों के मार्गदर्शन में श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया पूरी करते हैं।
श्राद्ध का मूल भाव केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर भी समझा जाता है। परिवार के दिवंगत सदस्यों को याद करना और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना पितृ पक्ष की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी कारण इन दिनों घरों से लेकर तीर्थ स्थलों तक पितरों के निमित्त धार्मिक कर्म किए जाते हैं।
हरिद्वार में गंगा और यहां मौजूद प्राचीन धार्मिक स्थलों के कारण पितृ पक्ष के दौरान विशेष धार्मिक वातावरण दिखाई देता है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु गंगा स्नान के साथ अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध करते हैं। नारायणी शिला पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह धार्मिक यात्रा आस्था और पारिवारिक परंपरा से जुड़ी होती है।
पितृ पक्ष में श्राद्ध की तिथि को लेकर भी विशेष ध्यान रखा जाता है। धार्मिक परंपराओं में जिस तिथि पर परिवार के सदस्य का निधन हुआ हो, उसी के अनुरूप पितृ पक्ष की तिथि पर श्राद्ध करने की परंपरा बताई जाती है। अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में
धार्मिक
विधियां भिन्न हो सकती हैं, इसलिए श्रद्धालु अपने पारिवारिक पुरोहित या जानकार विद्वानों के मार्गदर्शन में अनुष्ठान करते हैं।
नारायणी शिला की प्राचीनता और इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं इसे हरिद्वार के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में स्थान देती हैं। पितृ पक्ष आते ही यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में पूजा-अर्चना, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं तथा उनकी शांति और मोक्ष की कामना करते हैं।
पितृ पक्ष का संदेश भी पूर्वजों को याद करने और उनके योगदान के प्रति कृतज्ञ रहने से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में किए गए पितृ कर्म विशेष फलदायी माने जाते हैं। यही कारण है कि पीढ़ियों से परिवार इस परंपरा को आगे बढ़ाते आ रहे हैं।
हरिद्वार की प्राचीन नारायणी शिला पर पितृ पक्ष के दौरान दिखाई देने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इसी गहरी आस्था को दर्शाती है। गया और बद्रीनाथ जैसे पितृ तीर्थों के साथ नारायणी शिला की अपनी विशेष धार्मिक मान्यता है। श्रद्धालु विश्वास के साथ यहां पहुंचकर अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं और पितरों की शांति एवं मोक्ष की प्रार्थना करते हैं।
Next Story