धर्म-अध्यात्म

मां दुर्गा की विदाई पर काशी में सिंदूर उत्सव

Rajeshwari Nishad
21 Oct 2026 3:49 PM IST
मां दुर्गा की विदाई पर काशी में सिंदूर उत्सव
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Varanasi: नवरात्रि और दुर्गा पूजा के समापन के साथ ही मां दुर्गा की विदाई का समय आ गया है। देशभर में श्रद्धालु नम आंखों से मां को विदाई दे रहे हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश के वाराणसी यानी काशी में बंगाली समाज की महिलाओं ने मां दुर्गा की विदाई से पहले सिंदूर की होली खेलकर इस खास परंपरा को निभाया। महिलाओं ने पहले मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित किया और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर उत्सव मनाया। इस दौरान पूजा पंडालों में भक्ति, उत्साह और भावुकता का अनोखा संगम देखने को मिला।
मां दुर्गा की विदाई से पहले निभाई जाती है खास रस्म
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना बड़े श्रद्धाभाव से की जाती है। बंगाली समाज में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और उत्सव के समापन पर उन्हें विदाई दी जाती है। यही वजह है कि मां की विदाई को एक बेटी की विदाई की तरह भावनात्मक रूप से देखा जाता है।
जिस तरह किसी बेटी को मायके से विदा करते समय परिवार की महिलाएं पारंपरिक रस्में निभाती हैं, उसी तरह मां दुर्गा की विदाई से पहले भी कई विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। इन्हीं में से एक है सिंदूर खेला, जिसमें महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के बाद एक-दूसरे के साथ सिंदूर की होली खेलती हैं।
वाराणसी में भी बंगाली समाज की महिलाओं ने इस परंपरा को पूरे उत्साह के साथ निभाया। पूजा पंडालों में महिलाओं ने मां दुर्गा के चरणों में सिंदूर चढ़ाया और उनके सुख, समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली की कामना की।
क्या है सिंदूर खेला की परंपरा?
सिंदूर खेला बंगाली समाज की दुर्गा पूजा से जुड़ी एक प्रसिद्ध परंपरा है। इसे आमतौर पर विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की विदाई से पहले मनाया जाता है। इस रस्म में विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके बाद वे एक-दूसरे के माथे, गालों और मांग में सिंदूर लगाती हैं।
यह परंपरा केवल रंग और उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे सुहाग, सुख-समृद्धि और पारिवारिक मंगलकामना से भी जोड़कर देखा जाता है। महिलाएं मां दुर्गा से अपने परिवार की खुशहाली और सुखी वैवाहिक जीवन की प्रार्थना करती हैं। इसके साथ ही वे अपनी सखियों, रिश्तेदारों और परिचित महिलाओं के साथ इस उत्सव की खुशियां साझा करती हैं।
काशी में भी महिलाओं ने इसी परंपरा के तहत एक-दूसरे को सिंदूर लगाया। पूरे आयोजन में पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक आस्था की झलक देखने को मिली।
मां को बेटी मानकर दी जाती है विदाई
बंगाली समाज में मां दुर्गा को केवल शक्ति की देवी के रूप में ही नहीं, बल्कि घर आई बेटी के रूप में भी देखा जाता है। मान्यता है कि मां दुर्गा अपने बच्चों के साथ मायके आती हैं और कुछ दिनों तक भक्तों के बीच रहती हैं। पूजा के अंतिम दिन उनकी विदाई होती है, जिसे लेकर श्रद्धालुओं के मन में खुशी के साथ भावुकता भी रहती है।
इस दौरान महिलाएं मां को सिंदूर अर्पित कर उनसे सुख-शांति की प्रार्थना करती हैं।
सिंदूर खेला
के माध्यम से वे एक-दूसरे के प्रति स्नेह और अपनापन भी व्यक्त करती हैं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन की तैयारियां होती हैं और भक्त उन्हें अगले वर्ष फिर आने का निमंत्रण देते हैं।
इस परंपरा में मां की विदाई को परिवार की बेटी के मायके से ससुराल लौटने की तरह भावनात्मक रूप से देखा जाता है। यही वजह है कि सिंदूर खेला के दौरान जहां महिलाएं हंसी-खुशी के साथ रस्में निभाती हैं, वहीं मां की विदाई का ख्याल उन्हें भावुक भी कर देता है।
काशी में दिखा आस्था और संस्कृति का संगम
धार्मिक नगरी वाराणसी में विभिन्न परंपराओं और संस्कृतियों का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यहां बंगाली समाज के लोग भी दुर्गा पूजा को विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं। मां दुर्गा की पूजा से लेकर सिंदूर खेला और विदाई तक, हर रस्म का अपना सांस्कृतिक महत्व है।
लोकल 18 से काशी की जयंती के अनुसार, बंगाली समाज की महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के साथ उसी सिंदूर से अपनी सखियों और परिचितों के साथ भी उत्सव मनाती हैं। यह परंपरा महिलाओं के बीच आपसी जुड़ाव और सामुदायिक एकता को दर्शाती है।
सिंदूर खेला के दौरान महिलाएं पारंपरिक तरीके से मां की पूजा करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर विदाई की रस्म में शामिल होती हैं। इस आयोजन में धार्मिक आस्था के साथ बंगाली संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है।
अगले साल फिर मां के आगमन का इंतजार
नवरात्रि और दुर्गा पूजा का समापन भक्तों के लिए एक भावुक पल होता है। कई दिनों तक पूजा-पाठ, भजन और उत्सव में शामिल रहने के बाद मां दुर्गा को विदाई दी जाती है। हालांकि, श्रद्धालुओं के मन में यह विश्वास बना रहता है कि मां अगले वर्ष फिर उनके बीच आएंगी।
वाराणसी में सिंदूर खेला के साथ महिलाओं ने मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम प्रकट किया। यह परंपरा हर साल भक्तों को एक साथ जोड़ती है और धार्मिक उत्सव को सांस्कृतिक पहचान से भी जोड़ती है।
मां दुर्गा की विदाई के साथ पूजा पंडालों में उत्सव का समापन भले ही हो जाता है, लेकिन भक्तों की आस्था और अगले साल मां के स्वागत की उम्मीद बनी रहती है। काशी में खेली गई सिंदूर की होली इसी श्रद्धा, परंपरा और भावनात्मक जुड़ाव की खूबसूरत तस्वीर पेश करती है।
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