धर्म-अध्यात्म

जीवित्पुत्रिका व्रत में जितिया धागे का महत्व, जानें मान्यताएं

Tara Tandi
28 Sept 2026 8:02 PM IST
जीवित्पुत्रिका व्रत में जितिया धागे का महत्व, जानें मान्यताएं
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नई दिल्ली: हिंदू धर्म में कई ऐसे व्रत और त्योहार हैं, जिनका संबंध परिवार, संतान और सुख-समृद्धि से जुड़ा हुआ है। इन्हीं प्रमुख व्रतों में से एक है जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे आमतौर पर जितिया या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए रखती हैं।
यह व्रत हर साल आश्विन महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जितिया व्रत का पालन करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और उसे लंबी उम्र का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
संतान की सुरक्षा के लिए रखा जाता है व्रत
जीवित्पुत्रिका व्रत मुख्य रूप से माताओं द्वारा रखा जाने वाला कठिन व्रत माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की सलामती और सुखद जीवन के लिए भगवान से प्रार्थना करती हैं।
मान्यता है कि इस व्रत में माताएं पूरे श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करती हैं और अपने परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।
जितिया व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जितिया व्रत की परंपरा भगवान जीमूतवाहन से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जीमूतवाहन ने अपने त्याग और दया भाव से एक नागवंशीय परिवार की रक्षा की थी।
उनके इसी त्याग और धर्म पालन की कथा को याद करते हुए महिलाएं जितिया व्रत करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत से संतान को सुरक्षा और जीवन में शुभ फल प्राप्त होते हैं।
कठिन व्रतों में शामिल है जितिया
जीवित्पुत्रिका व्रत को कठिन व्रतों में शामिल किया जाता है। कई महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं और पूजा के बाद निर्धारित समय पर ही व्रत का पारण करती हैं।
व्रत के दौरान महिलाएं धार्मिक नियमों का पालन करती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं।
पूजा विधि और परंपराएं
जितिया व्रत के दिन महिलाएं सुबह स्नान आदि करके व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई कर भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है।
कई स्थानों पर व्रत कथा सुनने की परंपरा भी है। महिलाएं पूजा के दौरान फल, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करती हैं।
पूजा के बाद परिवार और संतान के कल्याण की कामना की जाती है।
तीन दिनों तक चलने वाली परंपरा
कई क्षेत्रों में जितिया व्रत की परंपरा तीन दिनों तक चलती है। इसमें नहाय-खाय, उपवास और पारण जैसे चरण शामिल होते हैं।
पहले दिन महिलाएं नियमों के अनुसार भोजन ग्रहण करती हैं और व्रत की तैयारी करती हैं। दूसरे दिन कठिन उपवास रखा जाता है। इसके बाद तीसरे दिन व्रत का समापन किया जाता है।
बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में विशेष महत्व
जीवित्पुत्रिका व्रत का विशेष महत्व बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में देखने को मिलता है।
इन क्षेत्रों में महिलाएं बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ इस व्रत को करती हैं। घरों में पूजा की तैयारियां की जाती हैं और महिलाएं पारंपरिक तरीके से व्रत का पालन करती हैं।
परिवार और मातृत्व से जुड़ी भावना
जितिया व्रत केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि मातृत्व की भावना से भी जुड़ा हुआ है।
माएं अपनी संतान के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी को इस व्रत के माध्यम से व्यक्त करती हैं। यह व्रत परिवार के प्रति समर्पण और संतान के प्रति शुभकामना का प्रतीक माना जाता है।
बदलते समय में भी कायम है परंपरा
आधुनिक समय में जीवनशैली में बदलाव के बावजूद जितिया व्रत की परंपरा आज भी कायम है। बड़ी संख्या में महिलाएं इस व्रत को श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ यह पर्व परिवार के सदस्यों को एक साथ जोड़ने का अवसर भी प्रदान करता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत भारतीय संस्कृति में मातृत्व, आस्था और परिवार के प्रति प्रेम का प्रतीक माना जाता है। संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के साथ मनाया जाने वाला यह व्रत आज भी लोगों की धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
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