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आज रात चांदनी में रखें खीर
धर्म डेस्क: शरद पूर्णिमा का पर्व आज रविवार, 25 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूजा और रात में खीर बनाकर चांदनी में रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणें अमृत के समान मानी जाती हैं। श्रद्धालु भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और चंद्र देव की आराधना कर परिवार के सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
इस बार पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर से शुरू होकर 26 अक्टूबर की सुबह तक रहेगी। इसलिए चंद्र पूजा और खीर रखने का पर्व रविवार की रात मनाया जाएगा, जबकि उदया तिथि के अनुसार पूर्णिमा का स्नान और दान सोमवार की सुबह किया जाएगा। दोनों अनुष्ठानों का समय अलग होने की वजह उनकी धार्मिक परंपरा है। चंद्र आराधना के लिए रात में पूर्णिमा तिथि का होना महत्वपूर्ण माना जाता है।
कब शुरू होगी पूर्णिमा तिथि?
पंचांग के अनुसार, आश्विन पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 55 मिनट पर शुरू होगी। इसका समापन 26 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 41 मिनट पर होगा। रविवार की रात पूर्णिमा तिथि रहने के कारण शरद पूर्णिमा की पूजा और व्रत इसी दिन किया जाएगा। सोमवार के सूर्योदय के समय भी पूर्णिमा तिथि रहेगी, इसलिए उस सुबह स्नान-दान का महत्व बताया गया है। इस तरह श्रद्धालु रविवार को व्रत, चंद्र दर्शन और रात्रि पूजा करेंगे। सोमवार को पूर्णिमा तिथि समाप्त होने से पहले स्नान और दान किया जा सकेगा। तिथि को लेकर भ्रम होने पर रात की पूजा और सुबह के स्नान-दान को अलग समझना उपयोगी है।
चंद्र पूजा और खीर रखने का समय
शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूजा चंद्रोदय के बाद की जाती है। चांद निकलने का समय शहर के अनुसार अलग होता है। इसलिए पूजा के लिए अपने क्षेत्र के चंद्रोदय का समय देखना जरूरी है। किसी एक शहर के समय को पूरे देश के लिए समान नहीं माना जा सकता। प्रकाशित पंचांग विवरण में 25 अक्टूबर की रात 8 बजकर 30 मिनट से 11 बजकर 30 मिनट के बीच चांदनी में खीर रखने का समय बताया गया है। परिवार अपनी परंपरा के अनुसार चंद्र दर्शन के बाद पूजा करके खीर का भोग लगा सकते हैं।
26 अक्टूबर की सुबह होगा स्नान-दान
पूर्णिमा के स्नान और दान के लिए सोमवार, 26 अक्टूबर की सुबह का समय बताया गया है। इस दिन पूर्णिमा तिथि सुबह 9 बजकर 41 मिनट तक रहेगी। ऐसे में सूर्योदय के बाद और तिथि समाप्त होने से पहले स्नान-दान किया जा सकता है। पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान और जरूरतमंदों को दान देने की धार्मिक परंपरा है। जो श्रद्धालु शरद पूर्णिमा की रात चंद्र आराधना करते हैं, उनके लिए अगले दिन का स्नान-दान पर्व का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है। रविवार की रात खीर रखने और सोमवार की सुबह स्नान करने की व्यवस्था इसी तिथि गणना पर आधारित है।
खीर रखने की परंपरा का क्या है महत्व?
शरद पूर्णिमा की रात दूध और चावल से बनी खीर चंद्रमा की रोशनी में रखने का चलन है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, इस रात की चांदनी विशेष शुभ मानी जाती है। इसी कारण खीर को भगवान को अर्पित करने के बाद कुछ समय के लिए चांदनी में रखा जाता है और बाद में प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। खीर रखने की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार बदल सकती है। कहीं उसमें मेवे मिलाए जाते हैं, तो कहीं साधारण दूध-चावल की खीर बनाई जाती है। पात्र को साफ जाली या ढक्कन से ढकने की सलाह दी जाती है, ताकि उसमें धूल और कीड़े न गिरें।
सोलह कलाओं और अमृत वर्षा की मान्यता
शरद पूर्णिमा के चंद्रमा को सोलह कलाओं से युक्त मानने की परंपरा धार्मिक आस्था से जुड़ी है। इसी विश्वास के आधार पर चांदनी को अमृत के समान बताया जाता है। ‘अमृत वर्षा’ का उल्लेख भी धार्मिक और लोकमान्यता के रूप में किया जाता है। श्रद्धालु इस रात चंद्र दर्शन, ध्यान और प्रार्थना करते हैं।
कोजागरी और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है
इस पर्व को कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। कोजागरी परंपरा में मां लक्ष्मी की पूजा और रात्रि जागरण का महत्व है। मान्यता है कि इस रात देवी पृथ्वी पर विचरण करती हैं। इसी विश्वास से श्रद्धालु जागरण और आराधना करते हैं। शरद पूर्णिमा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी रात श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास किया था। इस प्रकार चंद्र पूजा, लक्ष्मी आराधना, खीर का प्रसाद और स्नान-दान इस पर्व की प्रमुख परंपराएं हैं।
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