धर्म-अध्यात्म

एकादशी पर मोदक चढ़ाने के नियम: चावल और आटे का रखें ध्यान

Tara Tandi
12 Sept 2026 10:45 AM IST
एकादशी पर मोदक चढ़ाने के नियम: चावल और आटे का रखें ध्यान
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ज्योतिष न्यूज़ : गणेश उत्सव के दौरान घर में विराजमान गणपति बप्पा को सुबह-शाम अलग-अलग तरह के पकवानों का भोग लगाने की परंपरा है। मोदक, लड्डू और मिठाइयां इस पूजा का खास हिस्सा होती हैं। लेकिन इस साल गणेश उत्सव के बीच ही 22 सितंबर 2026 को परिवर्तिनी एकादशी पड़ रही है। ऐसे में उन घरों में थोड़ा असमंजस हो सकता है, जहां गणपति की स्थापना के साथ परिवार का कोई सदस्य एकादशी का व्रत भी रखता है। एकादशी के दिन चावल, गेहूं, दाल और दूसरे अनाज से बने खाद्य पदार्थों का सेवन सामान्यतः वर्जित माना जाता है। ऐसे में सवाल है कि गणपति बप्पा को उस दिन सामान्य मोदक या अनाज से बनी मिठाई का भोग लगाया जाए या नहीं? आइए जानते हैं विस्तार से।
गणेश उत्सव के दौरान कब है परिवर्तिनी एकादशी?
साल 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई जाएगी, जबकि अनंत चतुर्दशी और गणपति विसर्जन का मुख्य दिन 25 सितंबर रहेगा। यानी दस दिनों तक गणपति स्थापना रखने वाले घरों और पंडालों में 22 सितंबर को भी बप्पा विराजमान होंगे। पंचांग के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी की तिथि 21 सितंबर की रात करीब 8 बजे से शुरू होकर 22 सितंबर की रात 9:43 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के नियम के अनुसार एकादशी का व्रत 22 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा। व्रत का पारण 23 सितंबर की सुबह किया जाएगा। हालांकि अलग-अलग शहरों और पंचांगों के अनुसार समय में कुछ मिनटों का अंतर संभव है।
क्या एकादशी के दिन गणपति को सामान्य मोदक चढ़ा सकते हैं?
मोदक की सामग्री उसके प्रकार के अनुसार अलग-अलग होती है। महाराष्ट्र में लोकप्रिय उकड़ीचे मोदक मुख्य रूप से चावल के आटे से तैयार किए जाते हैं। वहीं कई जगह गेहूं का आटा, मैदा, सूजी या बेसन इस्तेमाल करके भी मोदक बनाए जाते हैं। एकादशी का व्रत रखने वाला व्यक्ति इन अनाजों से बनी चीजों का सेवन नहीं करता। इसलिए यदि घर में कोई व्यक्ति अनाज वाला एकादशी व्रत रख रहा है, तो उसके लिए ऐसे मोदक खाना उचित नहीं माना जाएगा। हालांकि यह बात अलग है कि एकादशी के आहार संबंधी नियम मुख्य रूप से व्रत रखने वाले व्यक्ति पर लागू होते हैं। गणपति को किस प्रकार का नैवेद्य चढ़ाना है, यह कई बार परिवार की परंपरा और स्थानीय मान्यताओं पर निर्भर करता है। कुछ वैष्णव परंपराओं में एकादशी के दिन घर में अनाज पकाने से भी परहेज किया जाता है और भगवान को फलाहारी नैवेद्य ही अर्पित किया जाता है। वहीं कुछ परिवारों में गणपति के नियमित नैवेद्य की अपनी अलग परंपरा होती है। इसलिए सभी परिवारों के लिए एक ही नियम तय करना उचित नहीं होगा। यदि घर में एकादशी का कठोर पालन किया जाता है, तो फलाहारी भोग रखना सबसे सरल विकल्प है। पारिवारिक परंपरा अलग होने पर अपने कुलाचार या पुरोहित द्वारा बताए नियम को प्राथमिकता दी जा सकती है।
परिवर्तिनी एकादशी पर गणपति को कौन-कौन से भोग लगाएं?
केला, सेब, अमरूद और दूसरे मौसमी फल
नारियल
मखाना
काजू, बादाम, अखरोट और दूसरे सूखे मेवे
दूध से बनी ऐसी मिठाइयां जिनमें अनाज न हो
मावा, नारियल और मेवों से तैयार मोदक
मिश्री और सूखे मेवों से बने फलाहारी नैवेद्य
नारियल, मावा और ड्राई फ्रूट्स से बिना अनाज वाला मोदक तैयार किया जा सकता ह
साबूदाना, राजगिरा या सिंघाड़े के आटे से भी मोदक बनाए जा सकते हैं।
अगर अन्न वाला मोदक भोग में चढ़ गया तो व्रती क्या करे?
मान लीजिए कि गणपति को चावल, गेहूं, मैदा, सूजी या बेसन से बना मोदक चढ़ाया गया है। ऐसी स्थिति में एकादशी व्रत रखने वाले व्यक्ति को उस प्रसाद का सेवन नहीं करना चाहिए। इसका मतलब यह भी नहीं है कि प्रसाद का अनादर किया जाए। उसे परिवार के उन सदस्यों को दिया जा सकता है जो व्रत नहीं कर रहे हैं। यदि घर में सभी लोग एकादशी का व्रत कर रहे हैं तो अनाज से बने प्रसाद को सुरक्षित तरीके से अलग रखकर द्वादशी के पारण के बाद ग्रहण किया जा सकता है। हालांकि दूध, मावा या अन्य जल्दी खराब होने वाली सामग्री से बने मोदक को लंबे समय तक रखने से बचना चाहिए। ऐसी स्थिति में पहले से फलाहारी मोदक या अन्य व्रत योग्य नैवेद्य तैयार करना अधिक सुविधाजनक रहेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल प्रसाद होने के कारण व्रत में निषिद्ध भोजन अपने आप व्रत योग्य नहीं हो जाता। व्रत का संकल्प लिया है तो उसके आहार नियमों का पालन करना चाहिए।
एकादशी पर पहले गणपति की पूजा करें या भगवान विष्णु की?
पूजा की शुरुआत गणेश वंदना से करने की परंपरा व्यापक रूप से प्रचलित है।
इसलिए सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर पहले गणपति बप्पा का स्मरण और पूजन किया जा सकता है।
गणपति को दूर्वा, फूल, फल और फलाहारी नैवेद्य अर्पित करें।
इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा कर एकादशी व्रत का संकल्प लिया जा सकता है।
भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी, फल और पंचामृत अर्पित करने की परंपरा है।
एकादशी के दिन तुलसी दल तोड़ने से बचने की मान्यता है। इसलिए तुलसी एक दिन पहले ही तोड़कर रख लेना बेहतर माना जाता है।
शाम के समय गणपति बप्पा और भगवान विष्णु की आरती की जा सकती है।
हालांकि पूजा का क्रम आपके परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो तो उसी का पालन करना उचित रहेगा।
परिवर्तिनी एकादशी को क्यों कहते हैं भगवान विष्णु की करवट बदलने वाली एकादशी?
परिवर्तिनी एकादशी को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। इसे पार्श्व एकादशी, पद्मा एकादशी और वामन एकादशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और परिवर्तिनी एकादशी के दिन करवट बदलते हैं। इसी मान्यता के कारण इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा गया है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है।
गणपति की पूजा और एकादशी व्रत दोनों कैसे रखें?
गणेश उत्सव के दौरान अगर घर में गणपति बप्पा विराजमान हैं और कोई सदस्य परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रख रहा है, तो पूजा और भोग बंद करने की जरूरत नहीं है। इस दिन बप्पा को फल, नारियल, मेवे या फलाहारी मोदक का भोग लगाया जा सकता है। अगर सा
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