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मंदिर परिक्रमा के नियम और महत्व, शास्त्रों के अनुसार इन गलतियों से बचना जरूरी

Religion Desk धर्म डेस्क : सनातन धर्म में मंदिर में देवी-देवताओं के दर्शन के बाद परिक्रमा करने का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, मंदिर का गर्भगृह सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र होता है और वहां से निकलने वाली दिव्य ऊर्जा भक्तों के जीवन में शांति और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करती है।
माना जाता है कि जब श्रद्धालु दर्शन के बाद गर्भगृह की परिक्रमा करते हैं, तो यह ऊर्जा उनके भीतर समाहित होती है और मन को सकारात्मकता प्रदान करती है। परिक्रमा को पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है, जो भक्त और ईश्वर के बीच संबंध को और गहरा करता है।
हालांकि, जानकारी के अभाव में कई श्रद्धालु परिक्रमा के दौरान कुछ गलतियां कर बैठते हैं, जिससे पूजा का पूर्ण फल नहीं मिल पाता। शास्त्रों में परिक्रमा से जुड़े कुछ विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करना आवश्यक माना गया है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, मंदिर की परिक्रमा हमेशा श्रद्धा और शांत मन से करनी चाहिए। जल्दबाजी या अनियमित तरीके से की गई परिक्रमा को शुभ नहीं माना जाता। इसके अलावा, परिक्रमा करते समय गर्भगृह की दिशा और देवता की परंपरागत परिक्रमा विधि का ध्यान रखना भी आवश्यक होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई लोग परिक्रमा के दौरान बातचीत करते रहते हैं या मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं, जिसे अनुचित माना गया है। परिक्रमा के समय मन को पूरी तरह से ईश्वर पर केंद्रित रखना चाहिए।
इसके अलावा, कुछ लोग परिक्रमा को अधूरा छोड़ देते हैं या बीच में रुक जाते हैं, जिसे शास्त्रों में उचित नहीं माना गया है। परिक्रमा को पूरी श्रद्धा और नियमों के अनुसार पूरा करना ही उसका सही फल देता है।
धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि अलग-अलग देवताओं के मंदिरों में परिक्रमा की संख्या और दिशा अलग हो सकती है, इसलिए श्रद्धालुओं को स्थानीय परंपराओं का पालन करना चाहिए।
कुल मिलाकर, मंदिर की परिक्रमा केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा को ग्रहण करने का माध्यम है। सही नियमों और श्रद्धा के साथ की गई परिक्रमा व्यक्ति के मन और जीवन दोनों में सकारात्मकता लाती है।





