धर्म-अध्यात्म

परिवर्तिनी एकादशी 2026: जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व

Tara Tandi
19 Sept 2026 7:44 PM IST
परिवर्तिनी एकादशी 2026: जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व
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ज्योतिष न्यूज़: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। इसमें व्रत रखते हुए भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष विधान होता है। हर माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष में एक-एक एकादशी आती है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इसमें भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा और व्रत रखा जाता है। इससे सुख-समृद्धि आती है। इस बार भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि दो दिन पड़ने के कारण असमंसज है। आइए जानते हैं सही तिथि, पूजा शुभ
मुहूर्त
और महत्व।
परिवर्तिनी एकादशी 2026
हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 21 सितंबर को रात 8 बजे से आरंभ होगी,जो 22 सितंबर को रात 9 बजकर 43 मिनट पर खत्म होगी। ऐसे में उदया तिथि के आधार पर परिवर्तिनी एकादशी व्रत 22 सितंबर 2026 है।
परिवर्तिनी एकादशी 2026 पारण
पंचांग के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पारण 23 सितंबर को सुबह 06 बजकर 10 मिनट से लेकर 08 बजकर 35 मिनट तक रहेगा।
परिवर्तिनी एकादशी 2026 धार्मिक महत्व
परिवर्तिनी एकादशी को हिंदू धर्म में विशेष महत्व होता है। इसे जयंती एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं और इस एकादशी पर भगवान विष्णु करवटें बदलते हैं जिस कारण से इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। ऐसे में इस दिन भगवान विष्णु की विशेष रूप से पूजा-आर्चन होती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ मंत्रों का जाप करना लाभकारी होता है। इस तिथि पर व्रत रखने से जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है।
भगवान विष्णु जी की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥
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