धर्म-अध्यात्म

पंढरपुर महायात्रा: 800 वर्षों की अटूट परंपरा और इतिहास

Tara Tandi
11 July 2026 4:52 PM IST
पंढरपुर महायात्रा: 800 वर्षों की अटूट परंपरा और इतिहास
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Pandharpur Mahayatra ज्योत्तिष्ठ न्यूज़: हिंदू सनातन धर्म में 'वारकरी संप्रदाय का कुंभ' कही जाने वाली पंढरपुर वारी (दिंडी यात्रा) महज एक पैदल यात्रा नहीं है। यह भगवान विठोबा (श्रीकृष्ण का स्वरूप) के प्रति अटूट प्रेम, समानता और असीम श्रद्धा का महासागर है। हर साल देवशयनी (आषाढ़ी) एकादशी के पावन अवसर पर लाखों भक्त भगवान विट्ठल की महापूजा और दर्शन के लिए इस पावन नगरी में एकत्रित होते हैं। आइए, इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा के
संपूर्ण स्वरूप को विस्तार
से जानते हैं।
1. वर्ष 2026 का यात्रा कार्यक्रम (भक्ति मार्ग)
यह एक अत्यंत अनुशासित 21 दिवसीय पैदल यात्रा होती है, जो महाराष्ट्र के विभिन्न कोनों से प्रारंभ होकर आषाढ़ी एकादशी पर पंढरपुर में संपन्न होती है। वर्ष 2026 का पूरा शेड्यूल इस प्रकार है।
7 जुलाई (देहू से प्रस्थान): संत तुकाराम महाराज की पावन पालकी ने देहू गांव से अपनी यात्रा शुरू की।
8 जुलाई (आलंदी से प्रस्थान): ज्ञान और भक्ति के प्रतीक संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी आलंदी से रवाना हुई।
23 जुलाई (वाखरी मिलन): अलग-अलग मार्गों से आ रही ये दोनों मुख्य पालकियां वाखरी नामक स्थान पर एक-दूसरे से मिलेंगी।
24 जुलाई (पंढरपुर आगमन): लाखों वारकरियों का यह विशाल समूह भगवान विठोबा की पावन नगरी में प्रवेश करेगा।
25 जुलाई (आषाढ़ी एकादशी महासंगम): चंद्रभागा नदी के तट पर पवित्र स्नान और विट्ठल दर्शन के साथ इस 21 दिनों की यात्रा का समापन होगा।
मोक्ष और आशीर्वाद: वारकरी संप्रदाय में मान्यता है कि इस कठिन पैदल यात्रा (जिसे 'वारी देना' कहते हैं) को करने से मनुष्य को मोक्ष और भगवान विठोबा की विशेष कृपा मिलती है।
सामाजिक समरसता का पर्व: इस यात्रा का मूल मंत्र 'भक्ति, समानता और बंधुत्व' है। यहाँ जाति, धर्म या सामाजिक ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होता। अमीर-गरीब सब एक समान होकर कंधे पर भगवा ध्वज, गले में तुलसी की माला और हाथों में मंजीरे लिए कदम बढ़ाते हैं।
जीवंत भक्ति संगीत: पूरी यात्रा के दौरान भक्त अपने प्रिय संतों के पदचिह्नों पर चलते हुए उनके रचित 'अभंग' (भक्ति गीत) और 'जय जय राम कृष्ण हरि' का निरंतर जयघोष करते हैं, जिससे मार्ग की पूरी थकान पल भर में गायब हो जाती है।
3. वारी का गौरवशाली इतिहास
800 वर्षों की परंपरा: इस महान परंपरा की शुरुआत 13वीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर महाराज ने की थी, जिन्होंने आलंदी से पंढरपुर तक पहली पैदल यात्रा की थी।
परंपरा का विस्तार: बाद में संत तुकाराम महाराज ने देहू से अपनी पालकी यात्रा शुरू कर इस भक्ति मार्ग को और सुदृढ़ किया। इन संत-कवियों ने अपने सरल अभंगों के माध्यम से भगवान के प्रति प्रेम को राजमहलों से निकालकर आम जनता की धड़कन बना दिया।
मूल रूप से 'पालकी परंपरा' को आधुनिक और सुव्यवस्थित रूप देने का श्रेय संत तुकाराम जी के सबसे छोटे पुत्र नारायण महाराज को जाता है, जिन्होंने 1685 में दोनों संतों की पादुकाओं को पालकी में ले जाने की शुरुआत की थी।
सांस्कृतिक धरोहर: आज यह यात्रा महाराष्ट्र की लोक-कला, आध्यात्मिकता और सामाजिक ताने-बाने का सबसे मजबूत हिस्सा बन चुकी है।
4. विठोबा मंदिर: इतिहास और स्थापत्य
भौगोलिक स्थिति: यह पावन मंदिर पश्चिमी भारत के दक्षिणी महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में, भीमा नदी के तट पर स्थित है।
स्थापना और निर्माण: पंढरपुर तीर्थ की स्थापना 11वीं शताब्दी में हुई थी, जबकि इसके मुख्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में देवगिरि के यादव शासकों द्वारा कराया गया था।
चंद्रभागा नदी का रहस्य: यहाँ भीमा नदी का आकार अर्धचंद्र जैसा होने के कारण इसे 'चंद्रभागा' कहा जाता है। मान्यता है कि इसमें स्नान करने से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं।
परिसर के अन्य मंदिर: मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप भक्त चोखामेला और प्रथम सीढ़ी पर संत नामदेव जी की समाधि है। निज मंदिर के घेरे में रुक्मिणी जी (रखुमई), बलराम जी, सत्यभामा, जांबवती तथा श्रीराधा के मंदिर हैं।
5. भगवान विट्ठल और भक्त पुंडलिक की अमर कथा
पंढरपुर तीर्थ की उत्पत्ति के पीछे ६वीं शताब्दी के परम भक्त पुंडलिक की एक बेहद सुंदर कथा है:
भक्त पुंडलिक अपने माता-पिता के परम सेवक थे। उनकी इस निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ साक्षात प्रकट हो गए। प्रभु ने पुंडलिक को आवाज दी, "हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं।"
उस समय पुंडलिक अपने पिता के पैर दबा रहे थे। उन्होंने अपनी भक्ति का त्याग किए बिना, पास पड़ी एक ईंट भगवान की ओर सरका दी और कहा, "प्रभु! मेरे पिताश्री शयन कर रहे हैं, कृपया आप इस ईंट पर खड़े होकर मेरी प्रतीक्षा करें।" भगवान ने अपने भक्त की आज्ञा शिरोधार्य की और दोनों हाथ कमर पर रखकर, पैरों को जोड़कर ईंट पर खड़े हो गए।
भक्त की सेवा भावना का मान रखने के लिए भगवान आज भी उसी रूप में वहां खड़े हैं। ईंट (विठ) पर खड़े होने के कारण वे 'विट्ठल' कहलाए और यह स्थान पुंडलिकपुर से अपभ्रंश होकर 'पंढरपुर' बन गया।
6. वारकरी संप्रदाय और प्रमुख संत
वारकरी का अर्थ: 'वारी' का अर्थ है परिक्रमा या यात्रा और 'करी' का अर्थ है करने वाला। भक्तराज पुंडलिक को इस संप्रदाय का ऐतिहासिक संस्थापक माना जाता है।
प्रमुख प्रवर्तक संत: संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत एकनाथ और संत तुकाराम इस संप्रदाय के मुख
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