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धर्म-अध्यात्म
मकर संक्रांति के मौके पर मां मुंडेश्वरी मंदिर में होती है विशेष पूजा, लगता है भव्य मेला
SHIDDHANT
7 Jan 2026 9:35 PM IST

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Delhi दिल्ली। देश में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी और मंदिरों में मकर संक्रांति को लेकर तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। बिहार में माता रानी का ऐसा मंदिर है, जहां मकर संक्रांति के दिन विशेष पूजन होता है और भक्तों के लिए खास मेले का भी आयोजन किया जाता है। हम बात कर रहे हैं मां मुंडेश्वरी मंदिर की, जिसकी विरासत और वास्तुकला दोनों ही अद्भुत हैं। देश के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल मां मुंडेश्वरी मंदिर में मकर संक्रांति के दिन विशेष पूजा होती है और मां मुंडेश्वरी और भगवान शिव की अराधना भक्त एक साथ करते हैं।
इस दिन मंदिर में तिलकुट, तिलवा, दही-चूड़ा और खिचड़ी भगवान को अर्पित किया जाता है और भक्तों में प्रसाद स्वरूप अर्पित भी किया जाता है। मंदिर में मकर संक्रांति के मौके पर बड़ा मेला भी लगता है, जहां दूर-दूर से भक्त मां का आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते हैं और मेले का भी आनंद लेते हैं। मां मुंडेश्वरी मंदिर पंवरा पहाड़ी के शिखर पर बना प्राचीन मंदिर है और मंदिर का निर्माण लगभग 108 ईस्वी में हुआ था। मंदिर की बनावट और वास्तुकला दोनों ही अद्भुत हैं, जो उत्तरगुप्तकालीन की शिल्पशैली को दिखाती हैं। यह पत्थर से बना हुआ अष्टकोणीय मंदिर है, जहां मां की प्रतिमा भी पत्थर से बनी है। खास बात ये है कि मां की प्रतिमा आठभुजी है और उनका ये रूप शक्ति, सुरक्षा और सिद्धि के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि मां के दर्शन मात्र से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
मंदिर में मां अकेले विराजमान नहीं हैं, बल्कि उनके साथ भगवान शिव भी बड़े शिवलिंग के रूप में स्थापित हैं। मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से मां और बाबा भोलेनाथ की पूजा होती है और भक्त दूर-दूर से मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर को शक्ति और प्रकृति का संगम माना जाता है, जहां शिव और शक्ति एक साथ विराजमान हैं। नवरात्रि और शिवरात्रि के मौके पर भी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखी जाती है। हजारों की संख्या में भक्त पहाड़ी चढ़कर मां के दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यहां रक्तहीन बलि चढ़ाई जाती है। मंदिर में मनोकामना पूरी होने पर बकरे की बलि चढ़ाई जाती है, लेकिन रक्त नहीं निकलता है। दरअसल, मंदिर के पुजारी पशु पर अक्षत छिड़कते हैं और पशु बेहोश हो जाता है और थोड़ी देर बाद खुद उठकर मंदिर प्रांगण से बाहर चला जाता है। इसे ही रक्तहीन कहा गया है।
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