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धर्म-अध्यात्म
बसंत पंचमी पर शृंगेरी शारदा पीठम में होता है 'अक्षराभ्यास,' ज्ञान की देवी बच्चों को देती हैं विशेष आशीर्वाद
SHIDDHANT
21 Jan 2026 10:19 PM IST

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Delhi दिल्ली। देशभर में ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित दिन बसंत पंचमी का त्योहार 23 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन विद्यालयों से लेकर मंदिरों तक में विशेष पूजा-पाठ और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। दक्षिण भारत में मां सरस्वती को समर्पित कई ऐसे मंदिर हैं, जहां ज्ञान की देवी मां सरस्वती का पूजन बड़े पैमाने पर किया जाता है। उन्हीं मंदिरों में से एक है शृंगेरी शारदा पीठम, जहां महर्षियों ने तपस्या की है और इसी वजह से आज भी इस मंदिर में वेदों को जानने और समझने वाले लोग शिक्षा लेने के लिए पहुंचते हैं।
कर्नाटक के चिकमंगलुर जिले में तुंगा नदी के किनारे शृंगेरी शारदा पीठम बना है, जिसे 1000 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है। मंदिर की नींव आदि शंकराचार्य ने रखी और यहीं पर महर्षि ऋष्यश्रृंग गिरी ने मां जगदम्बा स्वरूप सरस्वती की गहन तपस्या की थी। बसंत पंचमी के मौके पर मंदिर के हर कोने को फूलों से सजा दिया जाता है और विशेष परंपरा अक्षराभ्यास (शिक्षा आरंभ) की जाती है। अक्षराभ्यास बच्चों की शुरुआती शिक्षा का प्रतीक है, जहां मां सरस्वती के सामने बैठकर हजारों बच्चे पहला अक्षर लिखते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से बच्चों में बुद्धि और ज्ञान की बढ़ोतरी होती है।
मंदिर में भक्त सुबह से ही मां के दर्शन के लिए आना शुरू कर देते हैं और कई विशेष अनुष्ठानों का हिस्सा बनते हैं। मंदिर के पुजारी भी भक्तों की मनोकामना अनुसार यज्ञ कराते हैं। शृंगेरी शारदा पीठम अपने गौरवशाली इतिहास के लिए जाना जाता है। मंदिर को रामायण के समय से भी पुराना बताया जाता है। बहुत लोग जानते हैं कि ये यही मंदिर है, जहां पूजा-पाठ और अनुष्ठान कराने के बाद प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ था। माना जाता है कि यहीं आकर राजा दशरथ ने पुत्रकामेष्टि संपन्न कराई थी, जिसके बाद अयोध्या में प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ था। आज भी निसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिए मंदिर में पुत्रकामेष्टि कराने के लिए आते हैं।
मंदिर के पौराणिक महत्व के बारे में कहा जाता है कि 12वीं शताब्दी में श्री आदि शंकराचार्य सनातन धर्म की परंपरा को आगे बढ़ाने और वेदों का प्रचार-प्रसार करने के लिए पीठों की स्थापना करना चाहते थे। पवित्र तुंगा नदी के पास शंकराचार्य ने देखा कि एक नाग प्रसव पीड़ा से पीड़ित मेंढक को दोपहर की चिलचिलाती धूप से बचाने के लिए अपना फन फैलाए छाया दे रहा था। यह नजारा देखकर उन्हें हैरान और ज्ञान दोनों की प्राप्ति हुई कि कैसे दो प्राकृतिक शत्रु अपने स्वभाव से परे काम कर रहे हैं। इसी पवित्र स्थल पर शंकराचार्य ने शृंगेरी शारदा पीठम की स्थापना की, जो आज भी अपने इतिहास और वैदिक शिक्षा के लिए जाना जाता है।
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