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नई दिल्ली : हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है, लेकिन आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी कहा जाता है, अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और यहीं से चातुर्मास का शुभारंभ होता है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई, शनिवार को रखा जाएगा, जबकि व्रत का पारण 26 जुलाई को किया जाएगा।
धार्मिक मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने, व्रत रखने तथा दान-पुण्य करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन श्रद्धालु सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप प्रज्वलित करते हैं। इसके बाद तुलसी दल, पीले पुष्प, फल, पंचामृत और नैवेद्य अर्पित कर श्रीहरि का पूजन किया जाता है। विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा और एकादशी व्रत कथा का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रद्धालु दिनभर उपवास रखते हैं और अगले दिन विधिपूर्वक पारण करते हैं।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के जाने-अनजाने में हुए पापों का नाश होता है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उन पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा बनी रहती है। ऐसा माना जाता है कि श्रीहरि की कृपा से जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
देवशयनी एकादशी को मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी भी कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने वाला व्यक्ति जीवन में सुख-संपन्नता प्राप्त करने के साथ अंत में विष्णुलोक को प्राप्त करता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की संयुक्त पूजा करने से परिवार में समृद्धि, धन-धान्य और सौभाग्य का वास बना रहता है। इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजन का भी विशेष महत्व बताया गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि देवशयनी एकादशी का व्रत करने से 88 हजार यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान, जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, जल, छाता या दक्षिणा का दान करने का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है और व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
हिंदू परंपरा के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत केवल आध्यात्मिक उन्नति ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति और पारिवारिक सुख-समृद्धि का भी प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से घर में सुख-शांति बनी रहती है, नकारात्मकता दूर होती है और व्यक्ति के विचार पवित्र बनते हैं। भगवान विष्णु की आराधना से जीवन में धैर्य, संयम और आत्मविश्वास बढ़ता है।
धार्मिक विद्वानों के अनुसार, व्रत के दौरान सात्विक आचरण अपनाना, क्रोध, असत्य और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए। श्रद्धा, संयम और भक्ति भाव के साथ किया गया देवशयनी एकादशी व्रत ही पूर्ण फलदायी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास बना रहता है।





