धर्म-अध्यात्म

नीलाद्रि बीजे: जानिए भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी की रूठने-मनाने की अनोखी परंपरा

Tara Tandi
16 July 2026 2:58 PM IST
नीलाद्रि बीजे: जानिए भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी की रूठने-मनाने की अनोखी परंपरा
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ज्योतिष न्यूज़: भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा केवल रथों के खींचे जाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसके समापन से जुड़े कई ऐसे अनुष्ठान हैं, जिनका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बेहद खास माना जाता है। इन्हीं में से एक है नीलाद्रि बीजे। यह वह पावन अवसर होता है, जब भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा गुंडिचा मंदिर में नौ दिन का प्रवास पूरा करने के बाद दोबारा श्रीमंदिर में प्रवेश करते हैं। नीलाद्रि बीजे को रथ यात्रा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। इस दिन केवल भगवान के मंदिर लौटने का उत्सव ही नहीं मनाया जाता, बल्कि भगवान जगन्नाथ और
माता लक्ष्मी
के मिलन की अद्भुत लीला भी भक्तों को प्रेम, समर्पण और पारिवारिक सौहार्द का संदेश देती है।
नीलाद्रि बीजे का अर्थ क्या है?
'नीलाद्रि' शब्द का अर्थ है नीला पर्वत, जिस पर भगवान जगन्नाथ का पवित्र श्रीमंदिर स्थित है। वहीं 'बीजे' का अर्थ होता है प्रवेश करना या विराजमान होना। इसलिए नीलाद्रि बीजे उस शुभ अवसर को कहा जाता है, जब भगवान जगन्नाथ अपने मूल धाम श्रीमंदिर में पुनः विराजमान होते हैं।
रथ यात्रा से क्या है इसका संबंध?
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ भव्य रथ यात्रा पर निकलते हैं और गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। वहां नौ दिनों तक विश्राम करने के बाद बहुदा यात्रा के जरिए वापस श्रीमंदिर लौटते हैं। हालांकि मंदिर पहुंचने के बाद भी भगवान तुरंत गर्भगृह में प्रवेश नहीं करते। नीलाद्रि बीजे के दिन सभी पारंपरिक अनुष्ठानों के बाद भगवान को पुनः रत्न सिंहासन पर विराजमान कराया जाता है। इसी के साथ रथ यात्रा महोत्सव का समापन होता है।
माता लक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ की रोचक कथा
नीलाद्रि बीजे की सबसे प्रसिद्ध कथा माता लक्ष्मी से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ गुंडिचा मंदिर गए, तब वे माता लक्ष्मी को अपने साथ नहीं ले गए। इससे माता लक्ष्मी नाराज हो गईं। जब भगवान वापस श्रीमंदिर लौटे तो माता लक्ष्मी ने मंदिर का द्वार बंद कर दिया और भगवान के प्रवेश पर रोक लगा दी। भगवान जगन्नाथ ने माता लक्ष्मी का क्रोध शांत करने के लिए उन्हें प्रेमपूर्वक रसगुल्ला अर्पित किया। भगवान का यह स्नेह देखकर माता लक्ष्मी प्रसन्न हो गईं और मंदिर के द्वार खोल दिए। इसके बाद भगवान पुनः श्रीमंदिर में प्रवेश कर अपने सिंहासन पर विराजमान हुए। इसी की स्मृति में आज भी नीलाद्रि बीजे के दिन भगवान जगन्नाथ को रसगुल्ला अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है।
नीलाद्रि बीजे पर होने वाले प्रमुख अनुष्ठान
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का रथ से श्रीमंदिर में प्रवेश कराया जाता है।
सेवायत विशेष वैदिक मंत्रों और पारंपरिक विधि से विग्रहों को गर्भगृह तक ले जाते हैं।
भगवान और माता लक्ष्मी के मिलन की प्रतीकात्मक लीला का आयोजन किया जाता है।
भगवान को रसगुल्ला और अन्य विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं।
मंदिर में विशेष आरती, भजन और पूजा-अर्चना होती है।
इसी दिन रथ यात्रा का औपचारिक समापन माना जाता है।
रसगुल्ले का धार्मिक महत्व
नीलाद्रि बीजे पर भगवान जगन्नाथ को रसगुल्ला अर्पित करने की परंपरा केवल एक मिठाई चढ़ाने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह प्रेम, क्षमा और रिश्तों में मधुरता का प्रतीक मानी जाती है। ओडिशा में इस अवसर को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है और भगवान को रसगुल्ला का भोग लगाया जाता है।
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