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Maa Kushmanda Vrat Katha ज्योतिष न्यूज़ : शारदीय नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। शास्त्रों के अनुसार मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं और उन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और भक्तों को ऊर्जा, स्वास्थ्य व सकारात्मकता का आशीर्वाद मिलता है। नवरात्रि में मां कूष्मांडा की पूजा के साथ उनकी व्रत कथा का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। आइए जानते हैं मां कूष्मांडा की व्रत कथा
मां कूष्मांडा व्रत कथा
एक पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व तक नहीं था और चारों ओर घोर अंधकार व्याप्त था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी दिव्य शक्ति और मंद मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण इन्हें सृष्टि की आदि-स्वरूपा और आदिशक्ति कहा जाता है। उनका निवास स्थान सूर्यमंडल के मध्य लोक में माना गया है। यहां निवास करने की क्षमता और सामर्थ्य केवल मां कूष्मांडा में ही है।
मां कूष्मांडा का तेज और कांति स्वयं सूर्य के समान दैदीप्यमान है। उनकी आभा से समस्त लोक प्रकाशित हो जाते हैं। मान्यता है कि मां कूष्मांडा की उपासना करने से भक्तों के समस्त रोग-शोक, कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं। साथ ही जीवन में आयु, यश, बल, आरोग्य और समृद्धि की वृद्धि होती है।
मां कूष्मांडा का स्वरूप विशेष रूप से करुणामयी माना गया है। वे अत्यल्प सेवा और साधना से भी शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। यही कारण है कि नवरात्रि के चौथे दिन उनका पूजन विशेष महत्व रखता है। जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ मां की आराधना करता है, उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, सफलता और खुशहाली का संचार होता है।
मां कूष्मांडा की उपासना से साधक को न केवल सांसारिक सुख-समृद्धि मिलती है, बल्कि आत्मबल, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक प्रगति भी प्राप्त होती है।
मां कूष्मांडा का ध्यान मंत्र:
॥ वन्दे वाञ्छितकामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम् ॥
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