धर्म-अध्यात्म

जगन्नाथ पुरी में पुरुष भी भरते हैं सिंदूर से अपनी मांग, जानिए इस अनोखी परंपरा का धार्मिक महत्व

nidhi
17 July 2026 3:40 PM IST
जगन्नाथ पुरी में पुरुष भी भरते हैं सिंदूर से अपनी मांग, जानिए इस अनोखी परंपरा का धार्मिक महत्व
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पुरी में पुरुषों के मांग में सिंदूर भरने की परंपरा क्यों निभाई जाती है?
भगवान जगन्नाथ की नगरी पुरी सिर्फ मंदिरों के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां की भक्ति परंपराएं भी दुनिया भर में अनोखी मानी जाती हैं। ऐसी ही एक अनोखी परंपरा 'सखी संप्रदाय' से जुड़ी हुई।
इस संप्रदाय से जुड़े लोग, फिर चाहे महिला हो या पुरुष श्रीकृष्‍ण यानी जगन्‍नाथ को अपना सखा, पति और प्रेमी मानते हैं। इतना ही नहीं, ये लोग उनके नाम का सिंदूर भी भरते हैं। यहां तक कि, पुरुष भी यहां पर भगवान जगन्नाथ के नाम का सिंदूर अपनी मांग में भरते हैं।
पहली बार सुनने पर यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपा आध्यात्मिक भाव बेहद गहरा और सुंदर है। इस विषय में हमारी बातचीत एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा से हुई । ज्‍योतिषाचार्य के अनुसार, 'भक्ति की सबसे ऊंची अवस्था में आत्मा और परमात्मा के बीच कोई भेद नहीं बचता। न कोई स्त्री रहती है, न कोई पुरुष। वहां सिर्फ प्रेम और समर्पण होता है। सखी संप्रदाय की यही सीख है।'
क्‍या है 'सखी संप्रदाय'?
इस संप्रदाय के जो मानने वाले हैं, उनका कहना है कि पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र पुरुष स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। बाकी सब जीव, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री, उनकी सखी स्वरूप हैं। यानी हम सब ईश्वर की प्रेमिकाएं हैं। जगन्नाथ पुरी में सखी संप्रदाय से जुड़े भक्तों की साधना पद्धति बहुत ही भावपूर्ण और आत्मीय है। यहां भक्त भगवान को पाने के लिए खुद को पूरी तरह उनके हवाले कर देते हैं।
जगन्नाथ पुरी में पुरुष क्यों करते हैं स्त्री रूप धारण?
इस संप्रदाय के पुरुष भक्त खुद को राधा रानी की सखी मानते हैं। इसलिए पूजा-पाठ और मंदिर दर्शन के समय वे साड़ी, चूड़ी, बिंदी और अन्य स्त्री आभूषण धारण करते हैं। उनका मानना है कि सखी बनकर ही वे राधा-कृष्ण की लीला में शामिल हो सकते हैं और उनके सबसे करीब पहुंच सकते हैं।
पुरुष क्‍यों भरते हैं 'मांग में सिंदूर'?
सखी भाव का सबसे बड़ा प्रतीक है मांग में सिंदूर। विवाहित स्त्रियां अपने पति के लिए मांग भरती हैं। ठीक उसी तरह सखी संप्रदाय के पुरुष भक्त भी भगवान जगन्नाथ को अपना पति और स्वामी मानकर अपनी मांग में सिंदूर भरते हैं। यह उनके प्रेम और समर्पण को दर्शाता है।
अहंकार मिटाती है यह 'परंपरा'
यह परंपरा सिर्फ वेशभूषा या दिखावे तक सीमित नहीं है। इसका आध्यात्मिक अर्थ बहुत गहरा है। यह परंपरा अहंकार को मिटाने का सबसे बड़ा प्रतीक है। जब कोई व्यक्ति अपनी पहचान, अपना लिंग, अपना अहंकार सब भूलकर सिर्फ ईश्वर का हो जाता है, तो उसे 'अनन्य भक्ति' कहते हैं। मांग में सिंदूर भरना और सखी का रूप धारण करना इसी अनन्य भाव की निशानी है।
भक्तों का 'श्री जगन्नाथ' भगवान को संदेश
इस परंपरा को निभाना किसी पर बोझ नहीं है, बल्कि भक्‍त की श्रद्धा है। इस परंपरा को निभाते हुए भक्‍तों का भाव होता है कि प्रभु, मैं आपका हूं, आप ही मेरे सब कुछ हैं।'मैं' की समाप्ति : हमारे अंदर सबसे बड़ी बाधा 'मैं' और 'मेरा' का अहंकार है। सखी संप्रदाय इस अहंकार को पूरी तरह मिटा देता है। जब एक पुरुष खुद को स्त्री रूप में देखता है, तो समाज की सोच, घमंड और देह का अभिमान अपने आप टूट जाता है। इसके बाद बचता है सिर्फ प्रेम और समर्पण।
अतः जगन्नाथ पुरी में पुरुषों द्वारा मांग में सिंदूर भरना कोई आडंबर नहीं है, बल्कि भक्ति की पराकाष्ठा है। यह हमें सिखाता है कि भगवान के दरबार में ऊंच-नीच, स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
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