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हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है।
हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है। पितृपक्ष में मृत पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, दान और पिंडदान किए जाते हैं। पितृपक्ष या श्राद्धपक्ष की शुरुआत इस साल 10 सितंबर से हो रही है जोकि 25 सितंबर तक रहेगी। वैसे तो पितृपक्ष में पूरे 16 दिनों तक तिथि के अनुसार पितरों का पिंडदान किया जाता है। लेकिन विशेष रूप से नवमी तिथि के दिन दिवंगत माताओं का श्राद्ध कर्म किया जाता है। इसे मातृ नवमी श्राद्ध कहते हैं। मातृ नवमी के दिन परिवार की ऐसी दिवंगत माताओं, बहुओं व बेटियों का पिंडदान किया जाता है जिनकी मृत्यु सुहागिन स्त्री के रूप में हुई। पितृपक्ष में इनका श्राद्ध करने से इनकी आत्मा को शांति मिलती है।
पितृपक्ष में कब है मातृ नवमी
हिंदू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद माह की पूर्णिमा एवं अश्विन माह की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक के समय को पितृपक्ष कहा जाता है। वहीं मातृ नवमी अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को होती है। इस साल अश्विन माह की नवमी तिथि सोमवार 19 सितंबर 2022 को पड़ रही है। नवमी तिथि रविवार 18 सितंबर संध्या 4:30 बजे प्रारंभ हो जाएगी और दूसरे दिन यानी सोमवार 19 सितंबर को संध्या 6:30 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार 19 सितंबर को दिवंगत माताओं का श्राद्ध किया जाएगा।
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क्या है मातृ नवमी का महत्व
पितृपक्ष में पड़ने वाली मातृ नवमी के दिन दिवंगत माताओं की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन इनका श्राद्ध करने से परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है। वहीं यदि घर की महिला इस दिन पूजा-पाठ और व्रत करती है तो उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मातृ नवमी के दिन दिवंगत माताओं का श्राद्ध करने से घर पर उनका आशीर्वाद बना रहत
न्यूज़ क्रेडिट :खुलासा इन
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