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धर्म-अध्यात्म
दही हांडी को UNESCO टैग दिलाने की तैयारी महाराष्ट्र का बड़ा कदम
nidhi
18 Aug 2026 10:02 AM IST

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दही हांडी पर महाराष्ट्र का बड़ा दांव जानें त्योहार का महत्व
मुंबई: महाराष्ट्र की प्रसिद्ध दही-हांडी परंपरा को अब वैश्विक पहचान दिलाने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने इस लोकप्रिय त्योहार को UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) सूची में शामिल कराने के लिए प्रयास शुरू करने की घोषणा की है। महाराष्ट्र के सांस्कृतिक कार्य मंत्री आशीष शेलार ने कहा कि दही-हांडी की सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक भावना को दुनिया के सामने रखने की कोशिश की जाएगी।
दही-हांडी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की सामाजिक एकता, टीम भावना और लोक संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। हर साल जन्माष्टमी के बाद मनाए जाने वाले इस पर्व में गोविंदा पथक मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर लटकी दही से भरी हांडी को फोड़ते हैं। यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की माखन चोरी की लीला से जुड़ी मानी जाती है।
भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को बचपन में माखन और दही बेहद पसंद था। गोकुल में वे अपने दोस्तों के साथ मिलकर ऊंचाई पर टंगी मटकी से माखन निकालते थे। इसी कथा को दही-हांडी उत्सव के रूप में दोहराया जाता है।
महाराष्ट्र में यह परंपरा केवल पूजा तक सीमित नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे यह सामूहिक उत्सव का रूप ले चुकी है। मोहल्लों, सोसायटियों और सार्वजनिक स्थानों पर लोग मिलकर आयोजन करते हैं। गोविंदा टीमें कई दिनों पहले से अभ्यास शुरू कर देती हैं ताकि मानव पिरामिड बनाकर हांडी तक पहुंच सकें।
टीमवर्क और सामुदायिक भावना का प्रतीक
दही-हांडी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामूहिक भागीदारी है। इसमें अलग-अलग उम्र, वर्ग और समुदाय के लोग शामिल होते हैं। मानव पिरामिड बनाने के लिए हर सदस्य का संतुलन, भरोसा और तालमेल बेहद जरूरी होता है।
नीचे की पंक्ति में मजबूत प्रतिभागी रहते हैं, जबकि सबसे ऊपर छोटे और हल्के प्रतिभागी हांडी फोड़ने के लिए पहुंचते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में टीमवर्क और आपसी सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
मुंबई और ठाणे में सबसे बड़ा आयोजन
महाराष्ट्र में मुंबई, ठाणे और आसपास के क्षेत्रों में दही-हांडी का उत्सव बड़े स्तर पर मनाया जाता है। हजारों लोग सड़कों पर निकलकर गोविंदा पथकों का उत्साह बढ़ाते हैं। ढोल-ताशे, संगीत और रंग-बिरंगे आयोजनों से पूरा माहौल उत्सवमय हो जाता है।
समय के साथ दही-हांडी प्रतियोगिताओं का स्वरूप भी बदला है। अब कई बड़े आयोजनों में लाखों रुपये तक के पुरस्कार रखे जाते हैं और विभिन्न गोविंदा मंडल एक-दूसरे से मुकाबला करते हैं।
UNESCO मान्यता क्यों महत्वपूर्ण है?
UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होने से किसी परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलती है। इससे उस परंपरा के संरक्षण, प्रचार और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में मदद मिलती है।
भारत की कई सांस्कृतिक परंपराएं पहले ही UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल हो चुकी हैं। दही-हांडी को भी इस सूची में शामिल कराने का उद्देश्य महाराष्ट्र की लोक संस्कृति और सामुदायिक परंपरा को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाना है।
स्पेन की मानव टावर परंपरा से भी जुड़ाव
दही-हांडी की मानव पिरामिड परंपरा का संबंध स्पेन के Castells (मानव टावर बनाने की परंपरा) से भी जोड़ा जाता है। दोनों परंपराओं में लोगों का समूह मिलकर ऊंचे मानव टावर बनाता है। इसी समानता के कारण दोनों देशों की सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संवाद भी हुआ है।
सुरक्षा भी बड़ी चुनौती
दही-हांडी की लोकप्रियता बढ़ने के साथ सुरक्षा को लेकर भी चिंता रही है। मानव पिरामिड के दौरान गिरने से चोट लगने की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसलिए आयोजकों से सुरक्षा नियमों का पालन करने, प्रशिक्षित गोविंदाओं को शामिल करने और उचित सावधानी बरतने की अपील की जाती है। महाराष्ट्र सरकार ने भी आयोजनों के दौरान सुरक्षा और यातायात नियमों का पालन करने पर जोर दिया है।
महाराष्ट्र की पहचान से जुड़ा उत्सव
दही-हांडी आज महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन चुकी है। यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ साहस, सहयोग और सामाजिक एकता का संदेश देता है। यही वजह है कि राज्य सरकार इसे केवल एक त्योहार नहीं बल्कि जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत करना चाहती है।
अगर दही-हांडी को UNESCO की मान्यता मिलती है तो यह महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि भारत की लोक परंपराओं के लिए भी बड़ी उपलब्धि होगी। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अनोखी सामुदायिक परंपरा को सुरक्षित रखने में मददगार साबित हो सकता है।
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