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धर्म-अध्यात्म
भगवान कृष्ण से कैसे जुड़ी अभ्यंग स्नान की परंपरा जानिए कथा
nidhi
1 Nov 2026 12:48 PM IST

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धर्म डेस्क : दीपावली के उत्सव में नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व है। कहीं इसे छोटी दिवाली कहा जाता है तो कहीं रूप चौदस और रूप चतुर्दशी के नाम से मनाया जाता है। इस दिन सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान करने की परंपरा है, जिसे अभ्यंग स्नान कहते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इसे शुद्धि, शुभता और नई शुरुआत से जोड़ा जाता है। इसकी सबसे प्रचलित कथा भगवान श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय से संबंधित है। मान्यता है कि अत्याचारी नरकासुर का वध करने के बाद भगवान कृष्ण ने तेल लगाकर स्नान किया था। इसी स्मृति में श्रद्धालु यह परंपरा निभाते हैं।
अभ्यंग स्नान में सामान्य स्नान से पहले शरीर पर तेल लगाया जाता है। कई परिवारों में इसके साथ उबटन लगाने का भी रिवाज है। तिल का तेल और पारंपरिक उबटन इस अनुष्ठान का हिस्सा हो सकते हैं, हालांकि सामग्री और विधि क्षेत्र तथा पारिवारिक परंपरा के अनुसार बदलती है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र पहनना और भगवान का स्मरण करना उत्सव की तैयारी का अंग माना जाता है। यह परंपरा केवल सजने-संवरने तक सीमित नहीं है। श्रद्धालु इसे बाहरी स्वच्छता के साथ मन में अच्छे विचारों और सकारात्मक संकल्पों को स्थान देने के अवसर के रूप में भी देखते हैं।
नरकासुर वध का प्रसंग श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 59वें अध्याय में मिलता है। इसके अनुसार नरकासुर के अत्याचारों की जानकारी मिलने पर भगवान कृष्ण सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर उसके राज्य पहुंचे। कथा में बताया गया है कि नरकासुर ने देवमाता अदिति के कुंडल और वरुण का छत्र समेत कई वस्तुएं अपने अधिकार में कर ली थीं। इंद्र ने भगवान कृष्ण से उसके कृत्यों की शिकायत की। इसके बाद कृष्ण ने उसके विरुद्ध अभियान चलाया। इस प्रसंग में पहले मुर नामक दैत्य और फिर नरकासुर से युद्ध का वर्णन आता है।
भागवत के इस विवरण में भगवान कृष्ण अपने चक्र से नरकासुर का वध करते हैं। उसके बाद पृथ्वी देवी उनसे प्रार्थना करती हैं और नरकासुर द्वारा छीनी गई वस्तुएं लौटाती हैं। कृष्ण उसके महल में बंदी बनाकर रखी गई स्त्रियों तक भी पहुंचते हैं। इस कथा को अत्याचार के अंत और बंधन से मुक्ति के संदेश के साथ याद किया जाता है। नरक चतुर्दशी से जुड़ी लोकपरंपराएं इसी विजय को उत्सव का आधार मानती हैं। हालांकि, मूल कथा का विवरण और बाद में प्रचलित त्योहार संबंधी मान्यताएं अलग स्रोतों से आती हैं। दोनों को एक ही वर्णन मान लेना उचित नहीं होगा।
अभ्यंग स्नान से जुड़ी एक प्रचलित धार्मिक व्याख्या में बताया जाता है कि युद्ध के बाद कृष्ण और सत्यभामा ने शरीर की स्वच्छता के लिए तेल लगाकर स्नान किया। स्वामी कृष्णानंद के दीपावली संबंधी प्रवचन में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। उसमें नरकासुर वध के बाद प्रातःकाल स्नान करने और विजय का उत्सव मनाने का प्रसंग आता है। इसी मान्यता के आधार पर लोग नरक चतुर्दशी की सुबह तेल स्नान को शुभ मानते हैं। इसे आस्था से जुड़ी परंपरा के रूप में समझना चाहिए, क्योंकि विभिन्न धार्मिक कथाओं और क्षेत्रीय वर्णनों में इसके विवरण अलग हो सकते हैं।
इस अनुष्ठान में सुबह के समय को विशेष स्थान दिया गया है। प्रचलित विधि के अनुसार अभ्यंग स्नान सूर्योदय से पहले किया जाता है। नरक चतुर्दशी का निर्धारण भी संबंधित चतुर्दशी तिथि की प्रातःकालीन स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है। इसलिए केवल कैलेंडर की तारीख देखकर हर स्थान के लिए एक जैसा समय मान लेना सही नहीं है। जो श्रद्धालु मुहूर्त के अनुसार स्नान करना चाहते हैं, उन्हें अपने शहर के पंचांग और स्थानीय सूर्योदय का समय देखना चाहिए। परिवार में चली आ रही विधि भी इस पर्व के पालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व का स्वरूप भी बदलता है। उत्तर भारत में छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम अधिक प्रचलित हैं। महाराष्ट्र में अभ्यंग स्नान इसकी प्रमुख पहचान है। तमिलनाडु और कर्नाटक की कई परंपराओं में नरक चतुर्दशी की सुबह दीपावली उत्सव का महत्वपूर्ण समय होती है। नाम और रीति में अंतर होने के बावजूद तेल स्नान, स्वच्छ वस्त्र और दीपों का प्रकाश कई जगहों पर साझा तत्व हैं। यही विविधता दिखाती है कि एक ही पौराणिक प्रसंग अलग समुदायों के पारिवारिक और सांस्कृतिक जीवन में अलग ढंग से स्थान बना सकता है।
नरकासुर की कथा की प्रतीकात्मक व्याख्या करें तो अभ्यंग स्नान को अहंकार, क्रोध और कटुता छोड़ने के संकल्प से भी जोड़ा जा सकता है। शरीर की सफाई दिखाई देती है, जबकि व्यवहार में बदलाव अपने प्रयास से आता है। त्योहार पर किसी से मनमुटाव दूर करना, घर-परिवार में सौहार्द बढ़ाना और दूसरों के प्रति संवेदनशील रहना इस संदेश को दैनिक जीवन में उतारने के तरीके हैं। इस दृष्टि से नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान एक पारिवारिक अनुष्ठान होने के साथ आत्मचिंतन का अवसर भी बनता है। नरकासुर वध की स्मृति इसके भीतर अन्याय के अंत और शुभ शुरुआत की आशा को जीवित रखती है।
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