धर्म-अध्यात्म

तुलसी माला पहनने के नियम जान लें गले में धारण करने की क्या है वजह

Ratna Netam
8 Aug 2026 3:52 PM IST
तुलसी माला पहनने के नियम जान लें गले में धारण करने की क्या है वजह
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धर्म : हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को बेहद पवित्र और पूजनीय माना जाता है। विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में तुलसी का संबंध भगवान विष्णु और भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि भगवान की पूजा में तुलसी दल का इस्तेमाल करने के साथ-साथ कई भक्त तुलसी की माला भी धारण करते हैं। आमतौर पर तुलसी की माला गले में पहनी जाती है। हालांकि, कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या तुलसी की माला को कलाई में भी पहना जा सकता है और अगर नहीं, तो इसके पीछे क्या मान्यता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार तुलसी की माला को गले में धारण करना अधिक उचित माना जाता है। हालांकि अलग-अलग संप्रदायों और परंपराओं में इसे धारण करने के नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए तुलसी माला से जुड़े किसी भी नियम को सार्वभौमिक धार्मिक कानून मानने के बजाय संबंधित परंपरा और गुरु की मान्यता के अनुसार समझना चाहिए।
तुलसी की माला को केवल आभूषण नहीं माना जाता। वैष्णव परंपरा में यह भगवान के प्रति भक्ति, समर्पण और आस्था का प्रतीक मानी जाती है। कई भक्त नियमित रूप से तुलसी की माला पहनकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का स्मरण और मंत्र जाप करते हैं। कुछ वैष्णव परंपराओं में गुरु से दीक्षा प्राप्त करने के बाद तुलसी की कंठी माला धारण करने की परंपरा भी है।
गले में तुलसी माला पहनने की परंपरा के पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। भक्तों का मानना है कि माला गले में रहने से व्यक्ति को हर समय भगवान का स्मरण बना रहता है। तुलसी की कंठी को वैष्णव पहचान का एक महत्वपूर्ण प्रतीक भी माना जाता है। कई साधु-संत और वैष्णव भक्त इसे भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण के संकेत के रूप में धारण करते हैं।
अब सवाल उठता है कि तुलसी की माला कलाई में क्यों नहीं पहननी चाहिए। धार्मिक मान्यताओं में तुलसी को पवित्र माना गया है और इसी कारण इसके साथ शुद्धता और सम्मान से जुड़े कई नियम बताए गए हैं। हाथ दिनभर अलग-अलग कामों में इस्तेमाल होते हैं। भोजन बनाने, सफाई करने, बाहर जाने और कई तरह की दैनिक गतिविधियों के दौरान हाथ कई वस्तुओं के संपर्क में आते हैं। इसी वजह से कुछ परंपराओं में तुलसी की कंठी को कलाई में पहनने से बचने की सलाह दी जाती है।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हर धार्मिक परंपरा में कलाई में तुलसी की माला पहनने को लेकर एक जैसा नियम नहीं मिलता। कुछ लोग तुलसी की छोटी माला या तुलसी से बनी कंगन जैसी वस्तुओं को कलाई में धारण करते हैं। इसलिए इसे पूरी तरह निषिद्ध बताना उचित नहीं होगा। यदि किसी व्यक्ति को अपनी परंपरा के नियमों की जानकारी नहीं है, तो वह अपने गुरु, आचार्य या संबंधित धार्मिक परंपरा के जानकार से सलाह ले सकता है।
तुलसी की माला धारण करने वाले व्यक्ति को उसकी साफ-सफाई और सम्मान का ध्यान रखना चाहिए। माला को जमीन पर नहीं फेंकना चाहिए और न ही उसे ऐसी जगह रखना चाहिए जहां उसकी पवित्रता को लेकर आपत्ति हो। यदि माला टूट जाए तो उसके मोतियों को इधर-उधर फेंकने के बजाय सम्मानपूर्वक सुरक्षित रखना बेहतर माना जाता है। माला को पहनते समय भी श्रद्धा और स्वच्छता का ध्यान रखने की परंपरा है।
तुलसी माला को लेकर एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे धारण करने का उद्देश्य केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं माना जाता। भक्तों के लिए यह भगवान के नाम का स्मरण करने और अपने जीवन में सात्विकता बनाए रखने का माध्यम भी है। तुलसी माला पहनने वाले कई लोग नियमित पूजा, मंत्र जाप और धार्मिक अनुशासन का पालन करते हैं।
इस तरह देखा जाए तो तुलसी की माला को गले में धारण करने की परंपरा वैष्णव धार्मिक मान्यताओं में विशेष महत्व रखती है। कलाई में इसे पहनने को लेकर अलग-अलग परंपराओं में अलग विचार मिल सकते हैं। इसलिए किसी एक नियम को सभी लोगों पर लागू करना सही नहीं होगा। यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष संप्रदाय या गुरु की परंपरा का पालन करता है, तो उसे उसी के निर्देशों के अनुसार तुलसी माला धारण करनी चाहिए।
धार्मिक आस्था व्यक्तिगत विषय है और तुलसी माला से जुड़े नियम भी अलग-अलग परंपराओं के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए इसे लेकर किसी भी मान्यता को वैज्ञानिक तथ्य या निश्चित परिणाम के रूप में नहीं लेना चाहिए। श्रद्धा के साथ तुलसी माला धारण करना ही इसकी परंपरा का मूल भाव माना जाता है।
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