धर्म-अध्यात्म

अहोई अष्टमी पर तारों को देखकर व्रत खोलने की जानें वजह

Rajeshwari Nishad
26 Oct 2026 8:50 PM IST
अहोई अष्टमी पर तारों को देखकर व्रत खोलने की जानें वजह
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धर्म । हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का विशेष धार्मिक महत्व है। यह व्रत संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए रखा जाता है। करवा चौथ की तरह अहोई अष्टमी का व्रत भी परिवार की मंगलकामना से जुड़ा हुआ है। अंतर इतना है कि करवा चौथ का व्रत मुख्य रूप से पति की दीर्घायु के लिए रखा जाता है, जबकि अहोई अष्टमी का व्रत संतान की रक्षा और खुशहाली की कामना के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। उत्तर भारत के कई राज्यों में महिलाएं इस दिन श्रद्धापूर्वक अहोई माता की पूजा करती हैं और संतान के सुखी जीवन का आशीर्वाद मांगती हैं।
करवा चौथ के बाद मनाया जाता है अहोई अष्टमी का पर्व
हिंदू पंचांग के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह पर्व करवा चौथ के चार दिन बाद आता है और दीपावली से लगभग आठ दिन पहले मनाया जाता है।
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और मध्य प्रदेश सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इस पर्व का विशेष महत्व है।अहोई अष्टमी को अहोई आठें के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान के लिए व्रत रखती हैं और अहोई माता की पूजा करती हैं।कुछ परिवारों में महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कई स्थानों पर अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार किया जाता है।
अहोई अष्टमी व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता की पूजा करने से संतान पर देवी की कृपा बनी रहती है। महिलाएं अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सफलता की कामना करती हैं।यह पर्व माता और संतान के बीच प्रेम, समर्पण और पारिवारिक संबंधों का प्रतीक माना जाता है।
कई परिवारों में यह व्रत पीढ़ियों से किया जा रहा है। माताएं अपनी बेटियों और बहुओं को इसकी पूजा विधि तथा कथा के बारे में बताती हैं।इस तरह अहोई अष्टमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पारिवारिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर भी है।
अहोई अष्टमी की पूजा के लिए जरूरी सामग्री
अहोई अष्टमी की पूजा में अहोई माता का चित्र, जल से भरा कलश, रोली, अक्षत, दीपक, फूल, फल, मिठाई और पूजा की थाली का इस्तेमाल किया जाता है।कुछ परिवारों में चांदी की अहोई या स्याहू का प्रतीक भी पूजा में रखा जाता है।पूजा के लिए साफ स्थान चुनकर वहां अहोई माता का चित्र लगाया जाता है। चित्र में आमतौर पर अहोई माता के साथ स्याहू और उसके बच्चों का चित्रण होता है।पूजा की सामग्री स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
अहोई अष्टमी की पूजा विधि
अहोई अष्टमी के दिन महिलाएं सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं।इसके बाद घर के पूजा स्थान को साफ करके अहोई माता की तस्वीर या प्रतीक स्थापित किया जाता है।शाम के समय पूजा की थाली तैयार की जाती है। अहोई माता के सामने दीपक जलाकर रोली, अक्षत, फूल और मिठाई अर्पित की जाती है।
इसके बाद अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है। महिलाएं संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।कई परिवारों में पूजा के बाद तारों को देखकर अर्घ्य दिया जाता है और फिर व्रत खोला जाता है।कुछ क्षेत्रों में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा भी है। इसलिए व्रत खोलने की विधि परिवार की धार्मिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
अहोई अष्टमी व्रत की पौराणिक कथा
अहोई अष्टमी से जुड़ी प्रचलित कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक साहूकार की पत्नी दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी लेने जंगल गई थी।मिट्टी खोदते समय अनजाने में उसके औजार से स्याहू के एक बच्चे की मृत्यु हो गई।कथा के अनुसार, इस घटना के बाद महिला के जीवन में संतान से जुड़ी परेशानियां आने लगीं। इससे दुखी होकर उसने अपनी गलती का पश्चाताप किया और अहोई माता की पूजा शुरू की।
महिला ने पूरी श्रद्धा से व्रत रखा और संतान के कल्याण की प्रार्थना की।धार्मिक कथा के अनुसार, अहोई माता की कृपा से उसके परिवार में फिर खुशियां लौट आईं।इसी मान्यता के कारण अहोई अष्टमी के दिन महिलाएं देवी की पूजा करके संतान की रक्षा और सुखी जीवन की कामना करती हैं।यह एक पारंपरिक धार्मिक कथा है, जिसे श्रद्धा और आस्था के साथ सुनाया जाता है।
तारों को देखकर क्यों खोला जाता है व्रत?
अहोई अष्टमी व्रत की एक प्रमुख परंपरा तारों को देखकर व्रत खोलने की है।धार्मिक मान्यता के अनुसार, शाम को अहोई माता की पूजा करने के बाद आकाश में तारे दिखाई देने पर उन्हें जल अर्पित किया जाता है।इसके बाद महिलाएं व्रत का पारण करती हैं।हालांकि, कुछ परिवारों में चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा भी प्रचलित है।इसलिए पूजा और पारण का समय स्थानीय पंचांग तथा पारिवारिक परंपरा के अनुसार निर्धारित किया जाता है।
अहोई अष्टमी पर किन बातों का रखें ध्यान?
व्रत के दिन घर में साफ-सफाई रखने और शांतिपूर्वक पूजा करने की परंपरा है।महिलाएं अपनी श्रद्धा के अनुसार अहोई माता की कथा सुनती हैं और संतान के लिए मंगलकामना करती हैं।यदि कोई महिला गर्भवती है, स्तनपान करा रही है या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रही है, तो उसे निर्जला व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। व्रत करना व्यक्तिगत श्रद्धा और क्षमता का विषय है।
अहोई अष्टमी का संदेश
अहोई अष्टमी का पर्व मातृत्व, प्रेम और परिवार की खुशहाली से जुड़ा हुआ है।इस दिन महिलाएं अपनी संतान के अच्छे भविष्य की कामना करती हैं और परिवार के सभी सदस्यों के सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं।
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