धर्म-अध्यात्म

जानें अयोध्या के राजा राम ने पृथ्वी पर क्यों लिया अवतार

Tara Tandi
5 Aug 2021 7:17 AM GMT
जानें अयोध्या के राजा राम ने पृथ्वी पर क्यों लिया अवतार
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अयोध्या में भगवान श्री राम का मंदिर सिर्फ लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा देवालय भर नहीं है,

जनता से रिश्ता वेबडेस्क| अयोध्या में भगवान श्री राम का मंदिर सिर्फ लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा देवालय भर नहीं है, बल्कि यह उस मर्यादा पुरुषोत्तम का मंदिर है, जिसके जैसा हर कोई पुत्र, पति, भाई, मित्र आदि पाना चाहता है. यही कारण है कि दुनिया भर में उनके जीवन से जुड़ी रामलीला होती है. दरअसल प्रभु श्रीराम एक ऐसी मणि है, जिससे जुड़ाव होते ही जीवन का सारा अंधेरा दूर हो जाता है. हरि का अर्थ होता है दुख को हरने वाला, तो आइए जानते हैं कि सभी का दुख हरने वाले प्रभु श्री राम ने आखिर इस पृथ्वी पर क्यों जन्म लिया –

मर्याादा पुरुषोत्तम भगवान राम करुणा और दया के सागर हैं. धर्म की रक्षा करने वाले हैं. मान्यता है कि पृथ्वी पर जब–जब धर्म की हानि होने लगती है, तब ईश्वर मनुष्य के रुप में अवतार लेता है. यही कारण है कि हमारें यहां कभी भगवान ने राम के रूप में तो कभी कृष्ण के रूप में अवतार लिया.

मान्यता है कि जब त्रेतायुग में धरती पर राक्षसों के अत्याचार बढ़ने लगे और प्राणी उनसे त्रस्त होने लगे तब सभी देवताओं ब्रह्मा जी के साथ मिलकर भगवान विष्णु की शरण में गये. तब भगवान विष्णु ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वे आने वाले समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा दशरथ के यहां जन्म लेंगे और सभी राक्षसों का वध करेंगे. इसके बाद उन्होने अपने वचन के अनुसार अयोध्या में जन्म लिया.

प्रभु श्री राम के अवतार की एक और कथा का वर्णन मिलता है. मान्यता है कि जय और विजय जो कि भगवान विष्णु के परम भक्त द्वारपाल थे, उन्हें ब्राह्मण शाप के कारण पृथ्वी पर रावण और कुंभकरण के रूप में जन्म लेना पड़ा. जिसके बाद उनका उद्धार करने के लिए भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर राम के रूप में अवतार लिया.

भगवान श्री राम के जन्म लेने की एक और कथा मनु और सतरुपा से जुड़ी हुई है. जिसमें भगवान विष्णु ने उनके यहां जन्म लेने का वरदान दिया था. मान्यता है कि अपने इसी वरदान को पूरा करने के लिए उन्होंने पृथ्वी पर जन्म लिया. मनु और सतरुपा अगले जन्म में राजा दशरथ और कौशल्या हुए, जिनके यहां भगवान श्री राम का अवतार हुआ.

(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)

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