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धर्म-अध्यात्म
सुख-समृद्धि के लिए करें रविवार का व्रत: जानें विधि और लाभ!
jantaserishta.com
28 Jun 2025 10:23 AM IST

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नई दिल्ली: रविवार को भगवान भास्कर का दिन माना जाता है। अग्नि पुराण में सूर्य देव को साक्षात ब्रह्म माना गया है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाले हैं, साथ ही सूर्य देव को इस चराचर जगत का पान करने वाला भी माना जाता है। इस दिन विशेष विधि से पूजा से मनोवांछित लाभ प्राप्त होता है।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि (सुबह 9 बजकर 14 मिनट तक) 29 जून को पड़ रही है। इसी दिन सूर्य मिथुन राशि में रहेंगे, वहीं चंद्रमा कर्क से सिंह राशि में प्रवेश करेगा। दृक पंचागानुसार 29 को चतुर्थी तिथि सुबह 9 बजकर 14 मिनट तक रहेगी, फिर उसके बाद पंचमी तिथि शुरू हो जाएगी। इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 57 मिनट से शुरू होगा और 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा और राहु काल का समय 5 बजकर 38 मिनट से शुरू होकर 7 बजकर 23 मिनट तक रहेगा।
अग्नि और स्कंद पुराणों के अनुसार, रविवार के दिन व्रत रखने से सुख, समृद्धि, आरोग्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत को किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के पहले रविवार से शुरू करना शुभ माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी है जिनकी कुंडली में सूर्य कमजोर है।
व्रत शुरू करने के लिए आप सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें, फिर मंदिर या पूजा स्थल को साफ करें और गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। एक चौकी पर कपड़ा बिछाकर पूजन सामग्री रखें, फिर सूर्य देव की पूजा करें, फिर व्रत कथा सुनें और उनकी पूजा करें। इसके बाद सूर्य देव को तांबे के बर्तन में जल भरकर उसमें लाल फूल, अक्षत और रोली डालकर सूर्य देव को अर्घ्य देने से विशेष लाभ मिलता है।
इसके अलावा रविवार के दिन आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने, सूर्य देव के मंत्र "ऊं सूर्याय नमः" या "ऊं घृणि सूर्याय नमः" का जप करने से भी विशेष लाभ मिलता है। रविवार के दिन गुड़ और तांबे के दान का भी विशेष महत्व है। इन उपायों को करने से सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही जीवन में सुख-समृद्धि और सफलता मिलती है।
एक समय भोजन करें, जिसमें नमक का सेवन न करें। गरीबों को दान करें। रविवार के दिन काले या नीले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए। इस दिन मांस-मदिरा का सेवन, झूठ बोलना, किसी का अपमान करना, बाल या दाढ़ी कटवाना, तेल मालिश करना और तांबे के बर्तन बेचना भी वर्जित माना गया है। व्रत का उद्यापन 12 व्रतों के बाद किया जाता है।
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