- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- धर्म-अध्यात्म
- /
- संतान की लंबी उम्र के...
धर्म-अध्यात्म
संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है जितिया व्रत, जानें कथा और नियम
nidhi
3 Oct 2026 7:40 AM IST

x
जितिया व्रत में क्यों खास है नोनी का साग
Jitiya Vrat 2026: संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाने वाला जितिया व्रत हिंदू धर्म के प्रमुख व्रतों में से एक माना जाता है। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत और जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है। खासतौर पर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में महिलाएं इस पर्व को श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाती हैं।
जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इसकी शुरुआत सप्तमी तिथि को नहाय-खाय से होती है। अष्टमी के दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और नवमी तिथि में विधि-विधान से पारण कर व्रत पूरा करती हैं। इस दौरान भगवान जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व माना गया है।
मछली और नोनी के साग की परंपरा
जितिया पर्व की सबसे अनोखी परंपराओं में नहाय-खाय के दिन मछली और नोनी का साग खाने की परंपरा भी शामिल है। हालांकि यह परंपरा सभी क्षेत्रों या परिवारों में नहीं होती। बिहार के मिथिला सहित कुछ इलाकों में व्रती महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार मछली ग्रहण करती हैं। वहीं कई परिवार पूरी तरह सात्विक भोजन करते हैं।
नोनी का साग इस पर्व में विशेष माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार नोनी का पौधा कठिन परिस्थितियों में भी तेजी से बढ़ता और फैलता है। इसी वजह से इसे संतान की लंबी आयु और वंश वृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है। कई घरों में नहाय-खाय के भोजन में नोनी का साग जरूर शामिल किया जाता है।
जितिया व्रत की पौराणिक कथा
जितिया व्रत से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा राजा जीमूतवाहन की है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जीमूतवाहन अत्यंत दयालु और परोपकारी राजा थे। उन्होंने राजपाट छोड़कर वन में रहने का निर्णय लिया था। एक दिन उन्हें एक वृद्ध नाग माता मिली, जो अपने पुत्र की मृत्यु के भय से दुखी थी।
नाग माता ने बताया कि पक्षीराज गरुड़ प्रतिदिन एक नाग को अपना भोजन बनाते हैं और उस दिन उसके पुत्र की बारी थी। यह सुनकर जीमूतवाहन ने नाग पुत्र के स्थान पर स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया। उनकी त्याग भावना देखकर गरुड़ प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और नागों को न खाने का वचन भी दिया। इसी कथा के कारण जीमूतवाहन की पूजा संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना के लिए की जाती है।
व्रत में इन नियमों का रखा जाता है ध्यान
जितिया को कठिन व्रत माना जाता है। व्रती महिलाएं अष्टमी तिथि में सूर्योदय से पहले भोजन और जल ग्रहण करने के बाद निर्जला उपवास करती हैं। इसके बाद पूजा के दौरान जीमूतवाहन की कथा सुनी जाती है और संतान की लंबी आयु एवं अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना की जाती है।
इस व्रत में पारण के समय का विशेष ध्यान रखने की परंपरा है। नवमी तिथि आने और स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्धारित समय पर व्रत खोला जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा और भोजन से जुड़ी परंपराओं में अंतर भी देखने को मिलता है। इसलिए परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार व्रत के नियमों का पालन किया जाता है।
जितिया केवल धार्मिक व्रत ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। नहाय-खाय से लेकर निर्जला उपवास और पारण तक हर चरण के साथ अलग-अलग मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।
Next Story





