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धर्म-अध्यात्म
संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है जितिया व्रत जानें तिथि
Ratna Netam
23 Sept 2026 7:46 PM IST

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धर्म : हिंदू धर्म में संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से कई व्रत रखे जाते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण व्रत है जितिया, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत और जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है। विशेष रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में इस व्रत का विशेष महत्व है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और उसके जीवन में आने वाले संकटों से रक्षा की कामना करते हुए यह कठिन व्रत रखती हैं।जितिया व्रत हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह पर्व तीन दिनों तक चलने वाली परंपराओं से जुड़ा है। पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन निर्जला व्रत और तीसरे दिन पारण किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है क्योंकि व्रती महिलाएं लंबे समय तक भोजन और जल ग्रहण नहीं करती हैं।
2026 में कब है जितिया व्रत?
पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि **3 अक्टूबर को रात करीब 11:09 बजे शुरू होकर 4 अक्टूबर को रात करीब 9:33 बजे समाप्त होगी।** उदया तिथि को आधार मानते हुए **जितिया व्रत रविवार 4 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा।**इसके अनुसार नहाय-खाय की परंपरा 3 अक्टूबर को होगी। महिलाएं 4 अक्टूबर को निर्जला व्रत रखेंगी और अगले दिन यानी 5 अक्टूबर को निर्धारित समय एवं स्थानीय परंपरा के अनुसार पारण करके व्रत पूरा करेंगी। अलग-अलग स्थानों के पंचांग में समय में मामूली अंतर संभव है, इसलिए पूजा और पारण का सटीक समय स्थानीय पंचांग से देखना उचित रहेगा।
किसकी होती है पूजा?
जितिया व्रत में मुख्य रूप से **जीमूतवाहन** की पूजा की जाती है। धार्मिक कथाओं में जीमूतवाहन को त्याग, दया और दूसरों के जीवन की रक्षा करने वाले महान राजा के रूप में वर्णित किया गया है। मान्यता है कि उन्होंने दूसरे के पुत्र की जान बचाने के लिए स्वयं का जीवन बलिदान करने का निर्णय लिया था।इसी कारण जीमूतवाहन को संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जुड़े इस व्रत में विशेष रूप से पूजा जाता है। कई स्थानों पर पूजा के दौरान जीमूतवाहन की कथा सुनने की परंपरा भी है।व्रती महिलाएं संतान के स्वास्थ्य और लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा विधि और लोक परंपराओं में कुछ अंतर देखने को मिल सकता है।
तीन दिनों तक चलता है जितिया पर्व
जितिया केवल एक दिन का उपवास नहीं बल्कि तीन दिनों तक चलने वाली धार्मिक परंपरा है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन महिलाएं स्नान करने के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं और अगले दिन के कठिन निर्जला व्रत की तैयारी करती हैं।दूसरा दिन इस पर्व का मुख्य दिन होता है। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले व्रत का संकल्प लेकर भोजन और पानी त्याग देती हैं। दिनभर पूजा-पाठ और धार्मिक कथा सुनने के बाद भी व्रत जारी रहता है।तीसरे दिन व्रत का पारण किया जाता है। पारण के बाद ही व्रती महिलाएं भोजन और पानी ग्रहण करती हैं। इसी वजह से इसे कठिन व्रतों में गिना जाता है।
महाभारत काल से कैसे जुड़ी है मान्यता?
जितिया व्रत से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में महाभारत काल की कथा का भी उल्लेख मिलता है। एक प्रचलित कथा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित से जुड़ी हुई है।महाभारत की कथा के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद अश्वत्थामा ने पांडव वंश को समाप्त करने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। उस समय अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा गर्भवती थीं और उनके गर्भ में परीक्षित थे। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने गर्भ में मौजूद परीक्षित की रक्षा की और उन्हें जीवनदान दिया।इसी कथा को संतान की रक्षा और जीवन से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि जितिया की पूजा परंपरा का मुख्य केंद्र जीमूतवाहन की कथा मानी जाती है। महाभारत से जुड़ी कथा अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व के धार्मिक महत्व को समझाने वाली लोकमान्यताओं के रूप में सुनाई जाती है।
क्या है जीमूतवाहन की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार जीमूतवाहन एक परोपकारी और दयालु राजा थे। उन्हें राज-पाट और सांसारिक सुखों की तुलना में लोगों की सेवा अधिक प्रिय थी। एक दिन उन्हें एक वृद्ध महिला रोती हुई दिखाई दी। पूछने पर महिला ने बताया कि गरुड़ को भोजन के रूप में उसके पुत्र की बलि दिए जाने की बारी आ गई है।यह सुनकर जीमूतवाहन ने महिला के पुत्र की जगह स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया। कहा जाता है कि उनके त्याग और दया से गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने नागों को न खाने का संकल्प लिया और जीमूतवाहन को जीवनदान दिया।इस कथा में जीमूतवाहन के त्याग को संतान की रक्षा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि जितिया व्रत में उनकी पूजा और कथा का विशेष महत्व माना गया है।
पूजा कैसे की जाती है?
जितिया के दिन महिलाएं स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनती हैं और पूजा का संकल्प लेती हैं। पूजा स्थान को साफ करके जीमूतवाहन से संबंधित प्रतीक या प्रतिमा स्थापित की जाती है। कई क्षेत्रों में मिट्टी और कुश से पूजा से जुड़ी आकृतियां बनाने की परंपरा भी है।पूजा में फल, फूल, धूप, दीप और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद जितिया व्रत कथा सुनी जाती है और संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना की जाती है।
निर्जला व्रत क्यों माना जाता है कठिन?
जितिया में महिलाएं लंबे समय तक पानी और भोजन ग्रहण नहीं करतीं। इसलिए इसे कठिन निर्जला व्रत माना जाता है। गर्मी या उमस होने पर निर्जला रहने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों या स्वास्थ्य संबंधी समस्या वाले लोगों को अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही उपवास करना चाहिए।
संतान की लंबी उम्र की होती है कामना
जितिया व्रत का मूल भाव संतान के कल्याण और उसकी रक्षा से जुड़ा है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करते हुए इसे श्रद्धा से रखती हैं। जीमूतवाहन के त्याग की कथा इस पर्व को जीवन की रक्षा, करुणा और निस्वार्थ प्रेम का संदेश भी देती है।इस साल **4 अक्टूबर 2026** को जितिया का मुख्य व्रत रखा जाएगा। नहाय-खाय से शुरू होने वाला यह पर्व पारण के साथ पूरा होगा। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी अनेक परिवारों में पूरी श्रद्धा और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ निभाई जाती है।
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