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झारखंड का छऊ नृत्य युद्ध कला से निकली रामायण महाभारत की अनोखी कहानी

nidhi
18 Aug 2026 12:58 PM IST
झारखंड का छऊ नृत्य युद्ध कला से निकली रामायण महाभारत की अनोखी कहानी
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युद्धभूमि से मंच तक पहुंचा छऊ नृत्य जानें इसकी अद्भुत कहानी
रांची: झारखंड की धरती पर जन्मा छऊ नृत्य (Chhau Dance) सिर्फ एक लोक नृत्य नहीं, बल्कि वीरता, कला और पौराणिक कथाओं का अद्भुत संगम है। कभी युद्ध कला और सैनिक अभ्यासों से जुड़ा यह नृत्य आज दुनिया भर में भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुका है। बिना किसी संवाद के केवल भाव-भंगिमा, चेहरे के मुखौटे और शरीर की मुद्राओं से छऊ कलाकार रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं को जीवंत कर देते हैं।
युद्ध कला से नृत्य तक का सफर
छऊ नृत्य की जड़ें प्राचीन मार्शल आर्ट और आदिवासी परंपराओं से जुड़ी मानी जाती हैं। इसमें तलवारबाजी, युद्ध कौशल, छलांग, तेज गति वाली शारीरिक मुद्राएं और योद्धाओं जैसी चाल शामिल होती है। माना जाता है कि पहले यह सैनिकों के अभ्यास और युद्ध कौशल को प्रदर्शित करने का माध्यम था, जो धीरे-धीरे कला और मनोरंजन का रूप लेता गया।
झारखंड के सरायकेला क्षेत्र का छऊ इसकी सबसे प्रसिद्ध शैलियों में शामिल है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल का पुरुलिया छऊ और ओडिशा का मयूरभंज छऊ भी इसी परंपरा का हिस्सा हैं।
बिना शब्दों के सुनाता है बड़ी-बड़ी कहानियां
छऊ नृत्य की सबसे खास बात यह है कि इसमें कलाकार संवाद नहीं बोलते। चेहरे के हाव-भाव, शरीर की गति, संगीत और नृत्य के जरिए पूरी कहानी दर्शकों तक पहुंचाई जाती है।
इसमें भगवान राम, रावण, अर्जुन, भीम, कृष्ण जैसे पौराणिक पात्रों की कथाओं को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है। रामायण और महाभारत के युद्ध प्रसंगों को छऊ कलाकार अपनी शारीरिक कला से जीवंत बना देते हैं।
मुखौटे हैं छऊ की पहचान
सरायकेला छऊ की सबसे बड़ी पहचान इसके आकर्षक मुखौटे हैं। कलाकार अलग-अलग पात्रों के अनुसार विशेष डिजाइन वाले मुखौटे पहनते हैं। ये मुखौटे सिर्फ सजावट नहीं होते, बल्कि पात्र की पहचान और भावनाओं को दिखाने का माध्यम होते हैं।
राक्षस, देवता, योद्धा और पशु पात्रों के लिए अलग-अलग तरह के मुखौटे तैयार किए जाते हैं।
संगीत और शरीर की ताकत का मेल
छऊ नृत्य में ढोल, नगाड़ा, धुमसा और शहनाई जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। तेज संगीत के साथ कलाकार कठिन शारीरिक मुद्राएं और कलाबाजियां दिखाते हैं।
इस नृत्य में कलाकारों को लंबे प्रशिक्षण की जरूरत होती है, क्योंकि इसमें शारीरिक संतुलन, ताकत और लय का विशेष महत्व होता है।
UNESCO की सूची में शामिल है छऊ
छऊ नृत्य को वर्ष 2010 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था। यह सम्मान इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है।
झारखंड की पहचान बना छऊ
सरायकेला छऊ आज झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। देश-विदेश में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इसकी प्रस्तुति दी जाती है। कई कलाकारों ने इस कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षण केंद्र भी शुरू किए हैं।
परंपरा बचाने की चुनौती
आधुनिक मनोरंजन के दौर में पारंपरिक कलाओं के सामने चुनौतियां भी बढ़ी हैं। छऊ कलाकारों का मानना है कि नई पीढ़ी को इस कला से जोड़ना जरूरी है, ताकि सदियों पुरानी यह विरासत आगे भी जीवित रह सके।
आज छऊ नृत्य सिर्फ झारखंड की संस्कृति नहीं, बल्कि भारत की उस कला परंपरा का प्रतीक है, जिसमें बिना बोले भी भावनाओं और कहानियों को पूरी दुनिया तक पहुंचाने की ताकत है।
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