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धर्म-अध्यात्म
नवरात्र में अखंड ज्योति के पास सोना सही या गलत जानें धार्मिक नियम
Ashish verma
9 Oct 2026 1:38 PM IST

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Navratri : नवरात्र में मां दुर्गा की उपासना के दौरान कई श्रद्धालु घर में अखंड ज्योति प्रज्वलित करते हैं। लगातार जलने वाले इस दीपक को देवी के प्रति श्रद्धा और पूजा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। इसकी देखभाल के लिए कुछ लोग पूजा वाले कमरे में ही सोते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि अखंड ज्योति के पास सोना धार्मिक दृष्टि से उचित है या नहीं। धार्मिक परंपराओं में इसके बारे में अलग निर्देश मिलते हैं, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से जलते दीपक को निगरानी के बिना छोड़कर सोना उचित नहीं है।
‘अखंड’ का अर्थ निरंतर होता है। अखंड ज्योति का संकल्प लेने वाले श्रद्धालु तय अवधि तक दीपक जलाए रखने का प्रयास करते हैं। इसके लिए घी या तेल और बाती की नियमित देखभाल की जाती है। कई परिवार नवरात्र के पहले दिन दीपक प्रज्वलित करते हैं और अपनी पूजा परंपरा के अनुसार इसे लगातार जलाते हैं। धार्मिक विवरणों में ज्योति को मां दुर्गा की उपस्थिति और भक्ति का प्रतीक बताया गया है। इसे जलाने के साथ उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
अखंड ज्योति वाले कमरे में सोने को लेकर कुछ प्रचलित पूजा निर्देशों में देवी या दीपक की ओर पैर नहीं करने की सलाह दी जाती है। इसके पीछे पूजा स्थल के प्रति सम्मान का भाव बताया जाता है। कुछ व्रत परंपराओं में भूमि पर शयन करने और सादगी अपनाने का उल्लेख भी मिलता है। हालांकि, इन निर्देशों को प्रत्येक परिवार और सभी श्रद्धालुओं के लिए एक समान धार्मिक आदेश नहीं समझना चाहिए। उपलब्ध विवरणों में इनके लिए ऐसा स्पष्ट शास्त्रीय संदर्भ नहीं दिया गया है, जिसके आधार पर इन्हें सार्वभौमिक नियम कहा जा सके।
इसलिए केवल पूजा वाले कमरे में सो जाने से पूजा स्वतः निष्फल हो जाती है या देवी नाराज हो जाती हैं, ऐसा निश्चित दावा करना उचित नहीं है। धार्मिक आचरण के लिए अपने परिवार की परंपरा और संकल्प की विधि समझी जा सकती है। लेकिन दीपक के बिल्कुल पास बिस्तर लगाकर सोना अलग मुद्दा है। उसमें खुली लौ, कपड़े और नींद के कारण दुर्घटना का खतरा मौजूद रहता है। धार्मिक सम्मान बनाए रखने के साथ इस व्यावहारिक जोखिम को समझना भी जरूरी है।
कई लोग मानते हैं कि दीपक के पास सोने से उसकी निगरानी होती रहेगी। वास्तव में सोया हुआ व्यक्ति लगातार निगरानी नहीं कर सकता। नींद के दौरान दीपक गिरने, आसपास रखी किसी वस्तु में आग लगने या लौ बढ़ने का तुरंत पता नहीं चल सकता। अग्नि सुरक्षा संबंधी निर्देश सोने की जगहों पर खुली लौ के इस्तेमाल से बचने और सोने से पहले जलती मोमबत्तियां बुझाने की सलाह देते हैं। यही खुली लौ का जोखिम तेल या घी के दीपक के संदर्भ में भी ध्यान देने योग्य है।
दीपक को मजबूत, स्थिर और साफ सतह पर रखना चाहिए, जहां वह आसानी से गिर न सके। उसके आसपास पर्दे, कागज, फूलों की सूखी सजावट, बिस्तर, कपड़े और अन्य जलने वाली वस्तुएं नहीं रखनी चाहिए। खुली लौ के लिए अग्नि सुरक्षा मार्गदर्शन ज्वलनशील सामान से कम से कम लगभग 30 सेंटीमीटर दूरी रखने की सलाह देता है। इसे दीपक की हर परिस्थिति के लिए पर्याप्त सुरक्षा की गारंटी नहीं समझना चाहिए। विशेष रूप से उड़ते पर्दों और ढीले कपड़ों को लौ से दूर रखना जरूरी है।
बच्चों को जलते दीपक के आसपास अकेले नहीं छोड़ना चाहिए। माचिस और लाइटर भी उनकी पहुंच से दूर रखें। दीपक जलाते या उसकी देखभाल करते समय बाल, दुपट्टा और ढीली आस्तीन लौ के करीब न जाएं। पूजा की चौकी पर इतना सामान जमा नहीं होना चाहिए कि दीपक तक सुरक्षित पहुंचना मुश्किल हो। लौ को बचाने के उद्देश्य से आसपास कपड़े या कागज का घेरा बनाना भी सुरक्षित विकल्प नहीं है। खुली आग के पास सजावट से अधिक सुरक्षित व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए।
अखंड ज्योति का संकल्प लेने से पहले देखभाल की व्यवस्था तय करना उपयोगी है। धार्मिक निर्देशों में भी घी या तेल की कमी से दीपक बुझने से बचाने के लिए जिम्मेदारी निर्धारित करने की बात कही गई है। व्यावहारिक तौर पर परिवार को यह समझना चाहिए कि रात में जागकर निगरानी कौन करेगा। केवल किसी सदस्य का घर में मौजूद होना पर्याप्त नहीं है, यदि सभी लोग सो रहे हों। लगातार सुरक्षित निगरानी संभव न हो तो अखंड दीप के संकल्प के बजाय नियमित पूजा में दीप जलाने की विधि पर अपने पुरोहित से मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
यदि दीपक हवा, तेल की कमी या बाती की समस्या से बुझ जाए तो घबराने की जरूरत नहीं है। कुछ धार्मिक व्याख्याओं में इसे प्राकृतिक कारणों से होने वाली घटना बताते हुए श्रद्धापूर्वक दोबारा दीप प्रज्वलित करने की सलाह दी गई है। इसे आने वाली अनहोनी का निश्चित संकेत नहीं माना जाना चाहिए। पहले दीपक और आसपास की स्थिति सुरक्षित करें, फिर अपनी पूजा परंपरा के अनुसार आगे बढ़ें। नवरात्र की उपासना में श्रद्धा और अनुशासन के साथ सावधानी भी जरूरी है। अखंड ज्योति की देखभाल का अर्थ उसके पास सोना नहीं, बल्कि जागते हुए सुरक्षित निगरानी रखना है।
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