धर्म-अध्यात्म

इस परिस्थितियों में महिलाएं करती हैं श्राद्ध और पिंडदान

Tara Tandi
12 July 2021 1:48 PM GMT
इस परिस्थितियों में महिलाएं करती हैं श्राद्ध और पिंडदान
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हिंदू धर्म में किसी की मृत्यु के पश्चात पिंडदान, श्राद्ध वगैरह करने का नियम है

जनता से रिश्ता वेबडेस्क | हिंदू धर्म में किसी की मृत्यु के पश्चात पिंडदान, श्राद्ध वगैरह करने का नियम है. लेकिन ज्यादातर ये परंपरा पुरुष ही निभाते हैं. तमाम लोगों का मानना है कि लड़कियां या महिलाएं ये काम नहीं कर सकतीं क्योंकि हमारे शास्त्रों में ये नियम नहीं हैं. लेकिन आपको बता दें कि ये गलत धारणा है. गरुड़ पुराण में कुछ विशेष परिस्थितियों में महिलाओं द्वारा श्राद्ध और पिंड दान करने की बात कही गई है. बता दें कि गरुड़ पुराण सनातन धर्म के 18 महापुराणों में से एक है जिसमें जीवन की तमाम नीतियों और नियमों के अलावा मृत्यु और मृत्यु के बाद की स्थितियों का वर्णन किया गया है. जानिए इसके बारे में.

गरुड़ पुराण में पिंडदान और श्राद्ध का विशेष महत्व बताया गया है और कहा गया है कि मृत्यु के पश्चात जिनका श्राद्ध और पिंडदान नहीं किया जाता, उन्हें दूसरे लोकों में कष्ट का सामना करना पड़ता है. लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि अगर श्राद्ध या पिंडदान सिर्फ पुरुष ही कर सकते हैं, तो उनका क्या होगा जिनकी कोई संतान नहीं है, जिनका कोई पुत्र नहीं है ?
इसको लेकर गरुड़ पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध सिर्फ श्रद्धा से की जाती है, जिन लोगों की संतान कन्या है, वो कन्या अगर अपने पितरों की श्राद्ध को श्रद्धापूर्वक करती है और उनके निमित्त पिंडदान करती है तो पितर उसे स्वीकार कर लेते हैं. इसके अलावा पुत्र की अनुपस्थिति में बहू या पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है.
बाल्मीकि रामायण में उल्लेख है कि वनवास के दौरान जब श्रीराम लक्ष्मण और माता सीता के साथ पितृ पक्ष के दौरान गया पहुंचे तो वे श्राद्ध के लिए सामग्री लेने गए हुए थे. इस बीच माता सीता को राजा दशरथ के दर्शन हुए और उन्होंने माता सीता से पिंडदान की कामना की. इसके बाद माता सीता ने फल्गु नदी, वटवृक्ष, केतकी फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर दशरथ जी का पिंडदान कर दिया. इससे वो संतुष्ट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया. इस तरह पुत्र की अनुपस्थिति में पुत्र वधु को भी पिंडदान और श्राद्ध का अधिकार शास्त्रों में दिया गया है.
(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)


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