- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- धर्म-अध्यात्म
- /
- Kashi में 'तंत्र की...
धर्म-अध्यात्म
Kashi में 'तंत्र की देवी' को चढ़ता है पहला गुलाल, सालों से चली आ रही अनोखी परंपरा
SHIDDHANT
2 March 2026 11:44 PM IST

x
Varanasi वाराणसी। शिवनगरी काशी के कण-कण में महादेव का वास है। बड़े से लेकर छोटे हर देवालय की अपनी एक अद्भुत कथा है। गंगा की नगरी में ऐसा ही एक 'तंत्र की देवी' का मंदिर है, जो अनोखी परंपरा को समेटे हुए है। काशी में रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ को रंग चढ़ाकर काशावासी होली खेलने की अनुमति मांगते हैं। इसके बाद चौसठ्ठी देवी को पहला गुलाल चढ़ाने की परंपरा है।
काशी में होली सिर्फ रंगों और उमंग का त्योहार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं और आस्था का जीवंत उत्सव है। यहां होली के दिन सबसे पहले मां चौसठ्ठी देवी के चरणों में गुलाल अर्पित किया जाता है। रंग-फाग खेलने के लिए काशीवासी मुट्ठी भर अबीर-गुलाल लेकर मां के दरबार पहुंचते हैं और तंत्र की इस देवी से मुक्ति, सुख और शांति की कामना करते हैं। बिना मां को गुलाल चढ़ाए काशी में होली अधूरी मानी जाती है। यह परंपरा सालों पुरानी है।
दशाश्वमेध घाट के पास स्थित चौसठ्ठी योगिनी मंदिर होली की शाम को अबीर-गुलाल के रंगों से रंग जाता है। पुराने समय में शहर के साथ-साथ आसपास के गांवों से भी लोग पैदल यात्रा कर मां को गुलाल चढ़ाने आते थे। गाजे-बाजे के साथ चौसठ्ठी यात्रा निकलती थी। समय के साथ यात्रा छोटी हो गई, लेकिन गुलाल अर्पण की परंपरा आज भी अटल है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, चौसठ्ठी देवी 64 योगिनियों का स्वरूप हैं। स्कंद पुराण के काशीखंड में वर्णन है कि इनका दर्शन और पूजन करने से पाप नष्ट हो जाते हैं। नवरात्र में इनकी आराधना से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ज्योतिषाचार्य और वैदिक कर्मकांडी पं. रत्नेश त्रिपाठी ने इसकी कथा सुनाई।
उन्होंने बताया, “प्राचीन काल में काशी में राजा दिवोदास राज करते थे। वे धार्मिक थे, लेकिन शिव की आराधना उन्हें पसंद नहीं थी। उन्होंने देवताओं से शर्त लगाई कि यदि शिव काशी छोड़कर चले जाएं तो वे काशी को स्वर्ग जैसा बना देंगे। देवताओं ने भोलेनाथ से प्रार्थना की और भगवान शिव कैलाश पर्वत पर चले गए। कुछ समय बाद बाबा विश्वनाथ ने 64 योगिनियों को काशी भेजा। योगिनियों को काशी इतनी प्रिय लगी कि वे यहीं बस गईं। इन्हीं को आज चौसठ्ठी देवी के रूप में पूजा जाता है।”
मंदिर में महिषासुर मर्दिनी और चौसठ्ठी माता की प्रतिमा स्थापित है। परिसर में मां भद्र काली का भी स्वरूप है। मान्यता है कि इनके दर्शन-पूजन से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और पापों से मुक्ति मिलती है। नवरात्र और होली के समय यहां भक्तों की भारी भीड़ लगती है। काशी के निवासी प्रभुनाथ त्रिपाठी ने बताया, “होली के दिन रंग खेलने से पहले मां चौसठ्ठी देवी को गुलाल चढ़ाना अनिवार्य है। बिना उनके आशीर्वाद के होली का उत्सव पूरा नहीं होता। मंदिर में शाम को विशेष पूजा होती है और भक्त अबीर-गुलाल चढ़ाकर मां से आशीर्वाद लेते हैं। चौसठ्ठी घाट का निर्माण 16वीं शताब्दी में बंगाल के राजा प्रतापादित्य ने कराया था। बाद में 18वीं शताब्दी में बंगाल के राजा दिग्पतिया ने जर्जर घाट का पुनर्निर्माण कराया।
Tagsकाशीवाराणसीहोलीचौसठ्ठी देवीयोगिनी मंदिरबाबा विश्वनाथगुलाल अर्पणदशाश्वमेध घाट64 योगिनियाँनवरात्रधार्मिक परंपराअबीर-गुलालआस्थामंदिर इतिहासजनता से रिश्ता न्यूज़जनता से रिश्ताआज की ताजा न्यूज़हिंन्दी न्यूज़भारत न्यूज़खबरों का सिलसिलाआज की ब्रेंकिग न्यूज़आज की बड़ी खबरमिड डे अख़बारहिंन्दी समाचारजनताJanta Se Rishta NewsJanta Se RishtaToday's Latest NewsHindi NewsIndia NewsKhabron Ka SilsilaToday's Breaking NewsToday's Big NewsMid Day Newspaperjantasamachar newssamacharHindi news
Next Story





