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धर्म-अध्यात्म
पूर्वजों की श्राद्ध तिथि भूल गए हैं तो जानें क्या है सही उपाय
nidhi
9 Sept 2026 11:30 AM IST

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धार्मिक नियम
नई दिल्ली: हिंदू धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है। कई बार लोगों को अपने माता-पिता या पूर्वजों की मृत्यु तिथि याद नहीं रहती। ऐसे में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुछ विशेष तिथियों पर पितरों के निमित्त पूजा और तर्पण किया जा सकता है।
तिथि भूलने पर करें सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध
यदि किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजों की श्राद्ध तिथि याद नहीं है या किसी कारण से उस दिन श्राद्ध नहीं हो पाया है, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। इस दिन सभी ज्ञात और अज्ञात पितरों को श्रद्धा अर्पित की जाती है।
धार्मिक मान्यता है कि सर्वपितृ अमावस्या पर किया गया श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए भी किया जा सकता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है।
पितृ पक्ष में क्यों किया जाता है तर्पण
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष का समय पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर माना जाता है। इस दौरान लोग पिंडदान, तर्पण, दान और ब्राह्मण भोजन जैसे धार्मिक कर्म करते हैं।
मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए इन कर्मों से पितरों की शांति की कामना की जाती है।
तर्पण और पिंडदान की सामान्य विधि
धार्मिक परंपरा के अनुसार पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों में:
सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं।
जल, काले तिल और कुश से तर्पण किया जाता है।
पितरों का स्मरण कर उनकी शांति की प्रार्थना की जाती है।
जरूरतमंदों को भोजन और वस्त्र का दान किया जाता है।
पिंडदान और अन्य कर्म स्थानीय परंपरा और पुरोहित की सलाह के अनुसार किए जाते हैं।
अमावस्या भी मानी जाती है पितरों के लिए खास
हर महीने आने वाली अमावस्या को भी पितरों के स्मरण और तर्पण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन स्नान, दान और पितृ कर्म करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
गया और पवित्र स्थानों पर पिंडदान की परंपरा
भारत में गया, वाराणसी जैसे धार्मिक स्थानों पर पिंडदान करने की विशेष मान्यता है। हालांकि, श्रद्धा भाव से घर पर भी पितरों का स्मरण और तर्पण किया जा सकता है।
श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण मानी गई है
धार्मिक ग्रंथों में श्राद्ध का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता बताया गया है। मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से किया गया पितृ स्मरण ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।
हालांकि, ये धार्मिक मान्यताएं हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में श्राद्ध की विधि और परंपराओं में अंतर हो सकता है।
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