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गोगा नवमी पर ऐसे करें जहरवीर गोगाजी की पूजा जानें तिथि और महत्व

nidhi
5 Sept 2026 11:51 AM IST
गोगा नवमी पर ऐसे करें जहरवीर गोगाजी की पूजा जानें तिथि और महत्व
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गोगा नवमी पर जहरवीर की आराधना

धर्म डेस्क: हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को गोगा नवमी का पर्व मनाया जाता है। यह दिन राजस्थान के प्रसिद्ध लोकदेवता वीर गोगाजी महाराज को समर्पित है। उन्हें जहरवीर गोगाजी, गुग्गा वीर, गोगा पीर और नागों के देवता जैसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। वर्ष 2026 में गोगा नवमी शनिवार 5 सितंबर को मनाई जा रही है। राजस्थान के अलावा हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश सहित उत्तर और पश्चिम भारत के कई क्षेत्रों में गोगाजी की विशेष आराधना की जाती है।

गोगा नवमी 2026 की तिथि
पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि 5 सितंबर 2026 को रात 12:13 बजे के आसपास शुरू होकर रात 9:53-9:54 बजे तक रहेगी। स्थान के अनुसार पंचांग के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। इसलिए स्थानीय पूजा के लिए अपने शहर के पंचांग का समय देखना बेहतर है।
इस साल गोगा नवमी का पर्व जन्माष्टमी के ठीक अगले दिन पड़ रहा है। 5 सितंबर को दही हांडी का उत्सव भी मनाया जा रहा है।
कौन हैं जहरवीर गोगाजी?
गोगाजी राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध लोकदेवताओं में शामिल हैं। लोक परंपराओं में उन्हें वीर योद्धा और सर्पों से रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें जाहरवीर, गोगा पीर, गुग्गा, गोगा चौहान और गोगा महाराज जैसे नामों से भी जाना जाता है।
गोगाजी की जन्मभूमि राजस्थान के चूरू क्षेत्र स्थित ददरेवा मानी जाती है। वहीं राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित गोगामेड़ी उनकी आस्था का प्रमुख केंद्र है। गोगा नवमी के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
क्या है गोगाजी की पावन कथा?
लोककथाओं के अनुसार गोगाजी का जन्म लंबे समय तक संतान सुख से वंचित परिवार में हुआ था। उनके जन्म को गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से भी जोड़कर देखा जाता है। आगे चलकर गोगाजी एक पराक्रमी योद्धा बने और लोककल्याण तथा धर्म की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया।
लोक मान्यताओं में गोगाजी को नागों पर विशेष सिद्धि प्राप्त होने की कथाएं भी मिलती हैं। इसी कारण समय के साथ लोगों ने उन्हें नागों के रक्षक और सर्पदंश से रक्षा करने वाले लोकदेवता के रूप में पूजना शुरू किया।
गोगाजी की कथा अलग-अलग क्षेत्रों की मौखिक लोक परंपराओं में अलग रूपों में सुनाई जाती है। इसलिए इनके जीवन से जुड़ी कई कथाओं को ऐतिहासिक तथ्य के बजाय धार्मिक-लोक मान्यता के रूप में समझना चाहिए।
गोगा नवमी की पूजा कैसे करें?
गोगा नवमी के दिन श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद पूजा स्थल को साफ करते हैं। कई क्षेत्रों में मिट्टी से गोगाजी की प्रतिमा बनाई जाती है, जबकि कुछ स्थानों पर उनके चित्र या घोड़े पर सवार स्वरूप की पूजा होती है।
पूजा में गोगाजी को जल, कच्चा दूध, रोली, अक्षत, फूल और धूप-दीप अर्पित करने की परंपरा है। चूरमा, गुड़-चना या खीर जैसे व्यंजनों का भोग भी लगाया जाता है। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार पूजा सामग्री और विधि में अंतर हो सकता है।
इसके बाद परिवार की सुख-समृद्धि और सर्प भय से रक्षा की कामना की जाती है। कई स्थानों पर गोगाजी के भजन गाए जाते हैं और रात्रि में जागरण भी आयोजित किया जाता है।
क्यों लगाया जाता है गोगाजी का निशान?
गोगा नवमी के आसपास कई क्षेत्रों में गोगाजी की छड़ी या निशान लेकर यात्रा निकालने की परंपरा है। श्रद्धालु गोगाजी के मंदिर या थान पर जाकर निशान चढ़ाते हैं और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में गोगाजी के थान विशेष रूप से देखने को मिलते हैं। इन स्थानों पर नाग की आकृति और घोड़े पर सवार गोगाजी का स्वरूप उनकी लोक मान्यता को दर्शाता है।
सर्पदंश से जुड़ी है विशेष मान्यता
गोगाजी की पूजा का सबसे प्रमुख पहलू नागों से जुड़ा है। लोक आस्था में माना जाता है कि उनकी आराधना करने से सर्प भय से रक्षा होती है। इसी कारण उन्हें 'नागों का देवता' और 'जहरवीर' कहा जाता है।
हालांकि सर्पदंश की स्थिति में धार्मिक उपाय पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। यह एक मेडिकल इमरजेंसी है और पीड़ित को बिना देरी अस्पताल पहुंचाना जरूरी है। गोगाजी से जुड़ी सर्पदंश की बातें धार्मिक और लोक मान्यताएं हैं, चिकित्सा का विकल्प नहीं।
हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों में आस्था
गोगाजी की लोक परंपरा की खासियत यह भी है कि उन्हें कई जगह गोगा पीर या जाहरपीर कहा जाता है। राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में विभिन्न समुदायों के लोग उनके स्थानों पर श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं।
गोगा नवमी इस तरह केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि राजस्थान और उत्तर भारत की समृद्ध लोक संस्कृति का भी हिस्सा है। वीरता, लोककल्याण और नागों से रक्षा की मान्यताओं से जुड़े जहरवीर गोगाजी के प्रति आस्था आज भी लाखों श्रद्धालुओं के बीच जीवित है।
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