धर्म-अध्यात्म

आलोचना के बीच कैसे बनाए रखें आत्मविश्वास? समझिए ‘सम-बुद्धि’ का अर्थ

nidhi
30 Oct 2026 8:10 AM IST
आलोचना के बीच कैसे बनाए रखें आत्मविश्वास? समझिए ‘सम-बुद्धि’ का अर्थ
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धर्म डेस्क: ऑफिस में कभी ऐसे सहकर्मी के साथ काम करना पड़ता है, जिसे आपके हर काम में कोई न कोई कमी नजर आती है। प्रेजेंटेशन तैयार करें तो डिजाइन पर सवाल, रिपोर्ट दें तो भाषा पर आपत्ति और समय से काम पूरा कर दें तो तरीके को लेकर टिप्पणी। लगातार ऐसा होने पर झुंझलाहट होना स्वाभाविक है। मुश्किल तब बढ़ती है, जब हर टिप्पणी का जवाब बहस से दिया जाने लगे या दूसरों की राय को अपनी योग्यता का अंतिम प्रमाण मान लिया जाए। ऐसी परिस्थितियों को समझने के लिए भगवद्गीता में अर्जुन को दी गई समत्व की सीख एक उपयोगी दृष्टिकोण दे सकती है।

गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 48 में श्रीकृष्ण अर्जुन को सफलता और असफलता में समभाव रखते हुए कर्म करने की शिक्षा देते हैं। कार्यस्थल के संदर्भ में इसका अर्थ यह लिया जा सकता है कि प्रशंसा मिलने पर जरूरत से ज्यादा उत्साहित होने और आलोचना मिलने पर पूरी तरह टूट जाने के बजाय अपने काम, विवेक और जिम्मेदारी पर ध्यान रखा जाए। यह यहां उस शिक्षा की व्यावहारिक व्याख्या है; ऑफिस के विवादों के लिए कोई सीधा धार्मिक निर्देश नहीं।
‘सम-बुद्धि’ का अर्थ भावनाओं को दबाना या हर बात चुपचाप स्वीकार करना नहीं है। इसका आशय अपनी प्रतिक्रिया चुनने की क्षमता बनाए रखना है। किसी की टिप्पणी बुरी लग सकती है, लेकिन उसके बाद क्या कहना है और कैसे कहना है, यह फैसला सोचकर लिया जा सकता है। शांत रहने और अपनी बात मजबूती से रखने में कोई विरोध नहीं है।
सबसे पहला कदम है जवाब देने से पहले थोड़ा ठहरना। यदि सहकर्मी कहे कि आपकी रिपोर्ट ठीक नहीं है, तो तुरंत यह कहने के बजाय कि उसे हर चीज में समस्या दिखती है, उससे स्पष्ट सुझाव मांगें। आप कह सकते हैं, “कृपया बताइए कि किस हिस्से में बदलाव चाहिए और उससे रिपोर्ट कैसे बेहतर होगी।” इससे बातचीत व्यक्तिगत नाराजगी से हटकर काम के ठोस बिंदुओं पर आ सकती है।
अगला कदम आलोचना की उपयोगिता परखना है। हर अप्रिय टिप्पणी गलत नहीं होती और हर आत्मविश्वास से कही गई बात सही नहीं होती। देखें कि सामने वाला किसी तथ्य की गलती बता रहा है, निर्धारित मानक की याद दिला रहा है या केवल अपनी पसंद व्यक्त कर रहा है। यदि आंकड़ा गलत है तो उसे सुधारना जरूरी है। लेकिन रंग या शब्दों की व्यक्तिगत पसंद को अनिवार्य नियम मानने से पहले टीम की जरूरत और तय निर्देश देखना उचित होगा।
उपयोगी सुझाव स्वीकार करना कमजोरी नहीं है। यदि सहकर्मी ने वास्तविक कमी पकड़ी है, तो सीधे कह सकते हैं, “यह बिंदु सही है, मैं इसे सुधार देता हूं।” इससे अपनी क्षमता कम नहीं होती। साथ ही, उस सुझाव को पूरे व्यक्तित्व पर टिप्पणी समझने से बचें। किसी एक रिपोर्ट में सुधार की जरूरत होने का अर्थ यह नहीं कि आप अपने काम में अयोग्य हैं।
बार-बार अस्पष्ट आलोचना होने पर काम शुरू करने से पहले अपेक्षाएं स्पष्ट करना मददगार हो सकता है। रिपोर्ट का उद्देश्य क्या है, अंतिम निर्णय कौन लेगा, कौन-सा प्रारूप चाहिए और समीक्षा कब होगी—इन बातों पर सहमति बनाएं। जरूरी निर्देश लिखित रूप में रखें। इससे बाद में बदलाव आने पर यह समझना आसान रहता है कि नई जरूरत सामने आई है या पहले से तय निर्देश पूरे नहीं हुए हैं।
यदि बातचीत का लहजा अपमानजनक होने लगे, तो सीमा तय करना भी जरूरी है। आप शांत स्वर में कह सकते हैं, “मैं काम से जुड़े सुझाव सुनने के लिए तैयार हूं, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणी से समस्या हल नहीं होगी।” सभी के सामने तीखी बहस करने के बजाय अलग से बात करना कुछ परिस्थितियों में अधिक उपयोगी हो सकता है। हालांकि, अपनी बात रखने के लिए हर बार अकेले बातचीत करना जरूरी नहीं; स्थिति और सहजता के अनुसार माध्यम चुनें।
अपने प्रदर्शन का आकलन केवल एक सहकर्मी की प्रतिक्रिया से न करें। काम की गुणवत्ता, समयसीमा, तय लक्ष्य और जिम्मेदार अधिकारी की प्रतिक्रिया को भी देखें। अपनी प्रगति और पूरे किए गए कार्यों का रिकॉर्ड रखना उपयोगी है। इससे सुधार की वास्तविक जरूरत और केवल नकारात्मक टिप्पणी के बीच फर्क समझने का आधार मिलता है।
यदि मामला लगातार अपमान, धमकी, भेदभाव या काम में जानबूझकर बाधा डालने तक पहुंच रहा है, तो केवल समभाव रखने से उसका समाधान मान लेना उचित नहीं होगा। घटनाओं की तारीख, संबंधित संदेश और काम पर पड़े असर का रिकॉर्ड रखें। संस्थान की प्रक्रिया के अनुसार प्रबंधक या मानव संसाधन विभाग के सामने तथ्यात्मक तरीके से बात रखी जा सकती है।
अर्जुन को दी गई समत्व की सीख को कार्यस्थल पर अपनाने का व्यावहारिक अर्थ है—आलोचना सुनें, उसकी सच्चाई परखें, जरूरी सुधार करें और सम्मान की सीमा बनाए रखें। सामने वाले की हर टिप्पणी पर नियंत्रण संभव नहीं, लेकिन अपने जवाब को अधिक स्पष्ट, संयमित और उद्देश्यपूर्ण बनाने का अभ्यास किया जा सकता है।

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