धर्म-अध्यात्म

मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु का विवाह कैसे हुआ? जानें पौराणिक कथा

nidhi
8 Nov 2026 10:23 AM IST
मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु का विवाह कैसे हुआ? जानें पौराणिक कथा
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देवताओं के सामने मां लक्ष्मी ने विष्णु को पहनाई वरमाला
Diwali 2026: हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन, वैभव, सौभाग्य और समृद्धि की देवी माना जाता है। दीपावली के पावन अवसर पर भगवान गणेश के साथ माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां लक्ष्मी का संबंध समुद्र मंथन की अद्भुत घटना से भी जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि जब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया, तब अनेक दिव्य रत्नों के साथ माता लक्ष्मी भी प्रकट हुई थीं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि समुद्र मंथन से प्रकट होने के बाद माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को ही अपना पति क्यों चुना और दोनों का विवाह कैसे हुआ?
इस कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध सहित विभिन्न पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। धार्मिक दृष्टि से यह प्रसंग केवल देवी लक्ष्मी के प्राकट्य की कहानी नहीं, बल्कि धर्म, सद्गुण, संतुलन और समृद्धि के संबंध को भी दर्शाता है। एक समय देवताओं की शक्ति और वैभव कमजोर पड़ गए थे। असुरों का प्रभाव बढ़ने लगा था। ऐसी स्थिति में देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली। भगवान विष्णु ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने की सलाह दी, ताकि समुद्र से अमृत प्राप्त किया जा सके।
समुद्र मंथन के लिए मंदार पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार धारण कर पर्वत को आधार दिया। इसके बाद देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन शुरू किया। मंथन के दौरान सबसे पहले भयंकर हलाहल विष प्रकट हुआ, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण किया। इसके बाद मंथन से अनेक दिव्य वस्तुएं और रत्न प्रकट हुए। इनमें उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष और अन्य दिव्य वस्तुएं शामिल थीं। इसी क्रम में माता लक्ष्मी का भी प्राकट्य हुआ।
पुराणों के अनुसार, जब माता लक्ष्मी समुद्र से प्रकट हुईं, तब उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य और तेजस्वी था। उनके आगमन से देवताओं और ऋषि-मुनियों में प्रसन्नता फैल गई। सभी ने देवी का स्वागत किया और उनका विधिपूर्वक अभिषेक किया। श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में वर्णन मिलता है कि माता लक्ष्मी के अभिषेक के लिए दिव्य जल की व्यवस्था की गई। समुद्र ने उन्हें पीले रेशमी वस्त्र भेंट किए। वरुण देव ने पुष्पमाला और विश्वकर्मा ने आभूषण अर्पित किए। देवी सरस्वती ने मोतियों की माला और ब्रह्मा ने कमल का फूल प्रदान किया। इस प्रकार देवी लक्ष्मी का भव्य स्वागत हुआ।
इसके बाद माता लक्ष्मी के जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग सामने आया। पौराणिक वर्णन के अनुसार, देवी लक्ष्मी ने अपने लिए योग्य वर का चयन करने का निश्चय किया। उनके सामने देवता, गंधर्व, सिद्ध और अन्य दिव्य शक्तियां उपस्थित थीं। माता लक्ष्मी ने सभी के गुणों का विचार किया, लेकिन उन्हें ऐसा कोई नहीं मिला जो पूर्ण रूप से दोषरहित, स्थिर और सभी सद्गुणों से संपन्न हो। अंततः उनकी दृष्टि भगवान विष्णु पर पड़ी।
भगवान विष्णु को धर्म, संतुलन, करुणा और जगत के पालनकर्ता के रूप में माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने लिए योग्य वर स्वीकार किया। उन्होंने कमल के फूलों से बनी सुंदर माला भगवान विष्णु के गले में डाल दी। इस प्रकार देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु का वरण किया। इस प्रसंग को माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के दिव्य मिलन के रूप में देखा जाता है। विभिन्न धार्मिक परंपराओं में इसका वर्णन विवाह और स्वयंवर के रूप में भी मिलता है। वैष्णव मान्यता के अनुसार, लक्ष्मी और नारायण का संबंध शाश्वत है। समुद्र मंथन का प्रसंग उनके इस दिव्य संबंध के प्रकट होने का प्रतीक माना जाता है।
माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के मिलन का धार्मिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता और माता लक्ष्मी को समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। दोनों का साथ यह संदेश देता है कि धन और वैभव का वास्तविक महत्व तभी है, जब उनका उपयोग धर्म, न्याय और लोककल्याण के लिए किया जाए। धार्मिक व्याख्याओं में माता लक्ष्मी का भगवान विष्णु को चुनना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि स्थायी समृद्धि का संबंध सदाचार, संयम और संतुलन से है। केवल धन प्राप्त करना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका सदुपयोग करना भी आवश्यक है।
दीपावली के अवसर पर माता लक्ष्मी की पूजा इसी समृद्धि और मंगल की कामना से की जाती है। श्रद्धालु घरों में दीप जलाते हैं, साफ-सफाई करते हैं और माता लक्ष्मी से सुख, शांति तथा वैभव का आशीर्वाद मांगते हैं। समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी के प्राकट्य और भगवान विष्णु के वरण की यह पौराणिक कथा आज भी भक्तों को धर्म और समृद्धि के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है। यह कथा बताती है कि सच्ची समृद्धि केवल भौतिक संपत्ति में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों, संतोष और धर्मपूर्ण जीवन में भी निहित है।
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