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धर्म-अध्यात्म
होलाष्टक को मानते हैं अपशगुन,जानें कब से प्रारंभ हो रहा है होलाष्टक
Kajal Dubey
16 Feb 2022 9:30 AM IST

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होलाष्टक को अपशगुन मानने का क्या कारण है?
जनता से रिश्ता वेबडेस्क। हिन्दू कैलेंडर के आधार पर फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होलाष्टक का प्रारंभ होता है. फाल्गुन पूर्णिमा तिथि (Phalgun Purnima) को होलिका दहन (Holika Dahan) के साथ ही होलाष्टक का समापन होता है. होली (Holi) के पूर्व 8 दिन जिसे होलाष्टक कहते हैं, उसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है. होलाष्टक की इन 8 तिथियों को अपशगुन माना जाता है. इस वजह से विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, मकान-वाहन की खरीदारी आदि होलाष्टक में वर्जित है. होलाष्टक के समय में कोई नया कार्य जैसे बिजनेस, निर्माण कार्य या नई नौकरी भी करने से बचना चाहिए. आइए जानते हैं कि इस साल होलाष्टक कब से शुरु हो रहा है, समापन कब होगा और इसे अपशगुन मानने का क्या कारण है?
होलाष्टक 2022 प्रारंभ
पंचांग के अनुसार, इस साल फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 10 मार्च को तड़के 02 बजकर 56 मिनट से हो रहा है और यह 11 मार्च को प्रात: 05 बजकर 34 मिनट तक रहेगी. ऐसे में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि 10 मार्च को है, इसलिए 10 मार्च दिन गुरुवार से होलाष्टक का प्रारंभ हो जाएगा.
होलाष्टक 2022 समापन
होलाष्टक का समापन होलिका दहन के दिन होता है. होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा को होती है. इस साल फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 17 मार्च दिन गुरुवार को दोपहर 01:29 बजे से शुरु हो रही है, जो 18 मार्च दिन शुक्रवार को दोपहर 12:47 बजे तक मान्य है. ऐसे में फाल्गुन पूर्णिमा 17 मार्च को है. 17 मार्च को होलिका दहन के साथ होलाष्टक का समापन हो जाएगा.
08 दिन नहीं होंगे मांगलिक कार्य
10 मार्च से होलाष्टक प्रारंभ हो रहा है और समापन 17 मार्च को हो रहा है. इस वजह से इन 8 दिनों तक कोई मांगलिक कार्य नहीं किए जाएंगे. ये 8 दिन अपशगुन वाले होते हैं.
होलाष्टक को क्यों मानते हैं अपशगुन
होलाष्टक को अपशगुन मानने का कारण भक्त प्रह्लाद और कामदेव से जुड़ा है. राजा हिरण्यकश्यप ने बेटे प्रह्लाद को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि से होलिका दहन तक कई प्रकार की यातनाएं दी थीं, अंत में बहन होलिका के साथ मिलकर फाल्गुन पूर्णिमा को भक्त प्रह्लाद की हत्या करने का प्रयास किया. लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से भक्त प्रह्लाद बज गए और होलिका आग में जलकर मर गई.
वहीं, भगवान शिव ने कामदेव को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को अपने क्रोध की अग्नि से भस्म कर दिया था. इन दो वजहों से ही होलाष्टक को अपशगुन माना जाता है.
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