धर्म-अध्यात्म

हरितालिका तीज पूजा: 16 पत्र, 10 सर्वोषधि और 9 मुख्य नियम

Tara Tandi
10 Sept 2026 7:03 PM IST
हरितालिका तीज पूजा: 16 पत्र, 10 सर्वोषधि और 9 मुख्य नियम
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ज्योतिष न्यूज़ : सनातन परंपरा में अनेक व्रतों का विधान है, जिनके श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान से साधक का परम कल्याण होता है। इन्हीं में अति विशिष्ट और महत्वपूर्ण व्रत है हरितालिका तीज। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। शास्त्रीय नियमानुसार, द्वितीया से युक्त तृतीया वर्जित मानी गई है, जबकि चतुर्थी से युक्त तृतीया तिथि ही ग्राह्य और उत्तम मानी जाती है। सौभाग्यवती स्त्रियों के साथ-साथ मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को कर सकती हैं।
1. हरितालिका तीज पूजन एवं विसर्जन विधि:
मंडप व स्थापना: सर्वप्रथम घर में ताजे पुष्पों से सजा हुआ मंडप (फुलेरा) बनाएं। उसके नीचे स्वर्ण निर्मित अथवा घर में प्रतिष्ठित शिव-गौरी के विग्रह को स्थापित कर व्रत का संकल्प लें।
षोडशोपचार पूजन: शिव-पार्वती के 108 नामों का स्मरण करते हुए 16 सुहाग पेटिका (सौभाग्य सामग्री) अर्पित करें और षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना करें।
हवन व विसर्जन: दूसरे दिन प्रातः शिव-गौरी के विग्रह के समक्ष तिल और घी से आहुति देकर हवन करें। इसके पश्चात आठ या सोलह सुहागन जोड़ों को आदरपूर्वक भोजन कराएं और सौभाग्य पेटिका भेंट कर व्रत का विसर्जन करें।
क्षेत्रीय परंपराएं: कई क्षेत्रों में फुलेरा निर्माण के लिए 16 प्रकार की वनस्पतियों तथा सर्वोषधि पूजन का विशेष विधान है। देश-काल-परिस्थिति के अनुसार सभी लोक-पद्धतियां ग्राह्य हैं, परंतु मूल शास्त्रोक्त विधि यही है।
2. कलश स्थापना हेतु 'सर्वोषधि'
शास्त्रों के अनुसार पूजन कलश में सर्वोषधि डालना अनिवार्य माना गया है। वनस्पति शास्त्र की जिन 10 औषधियों को शास्त्रों ने 'सर्वोषधि' की मान्यता दी है, वे इस प्रकार हैं:- मुरा, जटामांसी, वच, कुष्ठ, शिलाजीत, हल्दी, दारूहल्दी, सठी, चंपक, मुस्ता
3. षोडश पत्र (16 विशेष पत्तियां) और उनका धार्मिक महत्व
भगवान शिव एवं माता पार्वती को 16 विशेष पत्र अर्पित करने का विधान है। ध्यान रहे कि पूजन में पत्तियां हमेशा उल्टी और फूल-फल सीधे चढ़ाए जाते हैं:
बिल्वपत्र: अखंड सौभाग्य की प्राप्ति
जातीपत्र (चमेली): उत्तम संतान सुख
सेवंतिका: दांपत्य जीवन में मधुरता
बांस के पत्ते: वंश वृद्धि और निरोगता
देवदार पत्र: ऐश्वर्य और कीर्ति
चंपा पत्र: सौंदर्य व उत्तम स्वास्थ्य
कनेर पत्र: यश तथा मानसिक शांति
अगस्त्य पत्र: वैभव एवं समृद्धि
भृंगराज: साहस व पराक्रम
धतूरा पत्र: मोक्ष एवं बंधनों से मुक्ति
आम के पत्ते: मांगलिक कार्यों में सिद्धि
नीम के पत्ते: चरित्र निर्मलता व शुद्धि
अशोक के पत्ते: कष्ट निवारण व शांत जीवन
पान के पत्ते: परस्पर प्रेम व प्रगाढ़ता
केले के पत्ते: कार्य में पूर्ण सफलता
शमी के पत्ते: धन-धान्य और अक्षय समृद्धि
4. हरितालिका तीज के 9 अति-कठिन नियम व परंपराएं
कठोर निर्जला व्रत: इस व्रत में अन्न और जल का पूर्ण त्याग किया जाता है। अगले दिन सूर्योदय के बाद विधि-विधान से पूजा और पारण करके ही जल ग्रहण करने का नियम है।
आठों प्रहर पूजन: सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल से ही पूजा आरंभ होती है। इसमें बालू रेत अथवा काली मिट्टी से हाथों द्वारा शिव, पार्वती और गणेश जी की प्रतिमाएं बनाकर आठों प्रहर पूजन किया जाता है।
रात्रि जागरण व भजन: व्रत में पूरी रात जागकर माता पार्वती और शिव जी के मंगल गीत, लोकगीत और भजन-कीर्तन किए जाते हैं।
जागरण का धार्मिक महत्व: शास्त्रों में इस दिन रात्रि जागरण को अनिवार्य माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन रात्रि में असावधानीवश सो जाने से व्रत का फल निष्फल हो जाता है।
आजन्म निबाहने का संकल्प: यह व्रत एक बार प्रारंभ करने के बाद जीवनभर रखना होता है। यदि स्त्री अत्यंत अस्वस्थ या असमर्थ हो, तो उनके स्थान पर उनके पति या अन्य सुहागन स्त्री इस व्रत को पूरा कर सकती है।
पूजा का संक्षिप्त विधान: पूजा स्थल पर चौकी रखकर केले के पत्ते बिछाएं और मिट्टी के शिव-पार्वती व गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें। माता पार्वती को सुहाग सामग्री और शिवजी को धोती-अंगोछा अर्पित कर षोडशोपचार पूजा करें। कथा सुनने के बाद रात्रि जागरण करें। अगले दिन सुबह माता पार्वती को सिंदूर अर्पित कर, हलवे का भोग लगाकर व्रत खोलें।
कथा श्रवण का नियम: पूजन के दौरान हरितालिका तीज की पौराणिक व्रत कथा सुनना अत्यंत अनिवार्य है। इसके बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
व्रत का मुख्य उद्देश्य: सुहागन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं योग्य एवं मनचाहे वर की प्राप्ति हेतु यह अनुष्ठान करती हैं।
लोक-मान्यताएं व नियम पालन: लोक-परंपराओं में यह माना जाता है कि इस कठोर व्रत के दौरान नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करना चाहिए, जिससे व्रत का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त हो सके।
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