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धर्म-अध्यात्म
हलषष्ठी व्रत कथा: माँ का झूठ और पश्चाताप से चमत्कार
Tara Tandi
2 Sept 2026 10:44 AM IST

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Hal Shashthi व्रत ज्योतिष न्यूज़: हिंदू धर्म में संतान की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए अनेक व्रत और पर्व बताए गए हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण व्रत है हल षष्ठी, जिसे संतान की रक्षा और उनके मंगलमय जीवन की कामना से किया जाता है। आज हल षष्ठी के पावन अवसर पर माताएं श्रद्धापूर्वक व्रत रखती हैं और भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का स्मरण करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि हल षष्ठी की कथा सुनने और विधि-विधान से पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। हल षष्ठी का पर्व हमें केवल व्रत और पूजा का महत्व ही नहीं बताता, बल्कि यह भी सिखाता है कि जीवन में सत्य, धर्म और सदाचार का पालन करना कितना आवश्यक है। इसी भाव को समझाने वाली एक प्रसिद्ध कथा ग्वालिन और उसके नवजात पुत्र से जुड़ी है। आइए, आज हल षष्ठी के इस पावन अवसर पर जानते हैं इसकी पूरी व्रत कथा।
हल षष्ठी व्रत कथा
प्राचीन काल की बात है। एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी। उसके प्रसव का समय अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी, वहीं दूसरी ओर उसे अपने दूध-दही के खराब हो जाने की चिंता सता रही थी। अधिक लाभ कमाने की इच्छा से वह सिर पर दूध-दही के घड़े रखकर उन्हें बेचने के लिए निकल पड़ी। रास्ते में अचानक उसे असहनीय प्रसव पीड़ा होने लगी। वह पास की एक झरबेरी की झाड़ी की ओट में चली गई और वहीं उसने एक बालक को जन्म दिया। प्रसव के बाद उसने नवजात शिशु को उसी स्थान पर छोड़ दिया और स्वयं पास के गांव में दूध-दही बेचने चली गई।
उस दिन हल षष्ठी का पावन पर्व था। ग्वालिन ने अधिक धन कमाने के लालच में गाय और भैंस के दूध को मिलाकर गांव की स्त्रियों को भैंस का शुद्ध दूध बताकर बेच दिया। इस प्रकार उसने झूठ बोलकर उन स्त्रियों के व्रत और धार्मिक नियमों को भंग कर दिया। इधर, जिस स्थान पर ग्वालिन ने अपने नवजात पुत्र को छोड़ा था, उसके पास एक किसान अपने खेत में हल चला रहा था। अचानक उसके बैल बिदक गए। इसी दौरान हल की फाल बालक के पेट में लग गई और वह घायल होकर अचेत हो गया।
किसान ने जब यह देखा तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने झरबेरी के कांटों की सहायता से बालक के कटे हुए पेट को जोड़कर टांके लगा दिए और वहां से चला गया। कुछ समय बाद जब ग्वालिन दूध-दही बेचकर वापस लौटी और उसने अपने बच्चे की ऐसी दशा देखी, तो वह अत्यंत व्याकुल हो गई। उसे तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ। उसके मन में विचार आया कि उसने स्वार्थ और लालच के कारण झूठ बोलकर धर्म का अपमान किया था और शायद इसी अधर्म का परिणाम उसके बच्चे को भुगतना पड़ा है।
ग्वालिन को अपनी भूल पर बहुत पछतावा हुआ। उसने अपनी गलती सुधारने का निश्चय किया और तुरंत गांव वापस गई। वह घर-घर जाकर उन सभी स्त्रियों से अपनी गलती स्वीकार करने लगी, जिनसे उसने झूठ बोलकर दूध बेचा था। उसने उनसे क्षमा मांगी और भविष्य में ऐसा अधर्म न करने का संकल्प लिया। गांव की स्त्रियों ने उसके सच्चे पश्चाताप को देखकर उसे क्षमा कर दिया और उसे आशीर्वाद दिया। माताओं का आशीर्वाद लेकर ग्वालिन दोबारा उसी झरबेरी की झाड़ी के पास पहुंची।
वहां पहुंचकर जो दृश्य उसने देखा, उसे देखकर वह आश्चर्यचकित रह गई। उसका पुत्र जीवित और स्वस्थ अवस्था में खेल रहा था। यह देखकर उसकी आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े। उसने इसे अपने सच्चे पश्चाताप और धर्म की ओर लौटने का फल माना। उस दिन ग्वालिन ने मन में दृढ़ संकल्प लिया कि वह कभी भी स्वार्थ और लालच के कारण झूठ नहीं बोलेगी और न ही किसी के धर्म-कर्म को भंग करेगी। उसे यह सीख मिली कि अपने लाभ के लिए बोला गया झूठ और किया गया अधर्म अत्यंत गंभीर पाप है।
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