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धर्म-अध्यात्म
Govatsa Dwadashi 2025: जानें पूजा मुहूर्त, व्रत विधि और पौराणिक महत्व
Harrison
13 Oct 2025 9:33 PM IST

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Religion Spirituality,धर्म अध्यात्म : गोवत्स द्वादशी 2025: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत के नियम और पौराणिक कथा धार्मिक दृष्टि से कार्तिक मास का विशेष महत्व होता है, और इस मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता है। गोवत्स द्वादशी में गाय और बछड़े (वत्स) की पूजा की जाती है। यह पर्व द्वादशी तिथि को आता है, जो इस बार 1 नवंबर 2025 (शनिवार) को पड़ रही है। इसे वसुबरस के नाम से भी जाना जाता है और यह धनतेरस से एक दिन पहले मनाई जाती है।
गोवत्स द्वादशी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त
तिथि आरंभ: 1 नवंबर 2025 को सुबह 05:15 बजे
तिथि समाप्त: 2 नवंबर 2025 को प्रातः 03:48 बजे
पूजा का श्रेष्ठ समय: 1 नवंबर को सुबह 06:15 बजे से 08:30 बजे तक (स्थानीय पंचांग के अनुसार)
गोवत्स द्वादशी का महत्व
हिंदू धर्म में गौमाता को देवी का स्वरूप माना गया है। गोवत्स द्वादशी पर गाय और उसके बछड़े की पूजा कर संतान की लंबी उम्र, सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।
यह पर्व विशेषकर महिलाएं करती हैं, जो संतानवती हैं। वे दिनभर व्रत रखकर शाम को गाय और बछड़े की विधिवत पूजा करती हैं।
पूजा विधि
प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
गाय और बछड़े को स्नान कराकर हल्दी, कुमकुम, फूल और चावल से पूजन करें।
उन्हें गुड़, चना, हरा चारा, और गेहूं अर्पित करें।
धूप-दीप जलाएं और गोवत्स द्वादशी व्रत कथा का पाठ करें।
गौमाता की परिक्रमा करें और आशीर्वाद लें।
यदि घर के पास गाय न हो, तो गाय की तस्वीर या मिट्टी की मूर्ति से पूजा की जा सकती है।
व्रत के नियम
इस दिन नमक, तेल और तले-भुने भोजन से परहेज़ करना चाहिए।
व्रती महिलाएं दिनभर उपवास रखती हैं और शाम को पूजा के बाद फलाहार या व्रत का भोजन करती हैं।
व्रत रखने वाली महिलाओं को इस दिन झूठ, छल और विवाद से दूर रहना चाहिए।
गो सेवा करना, गाय को भोजन कराना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है।
पौराणिक कथा (व्रत कथा का सारांश)
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार एक स्त्री ने इस व्रत को विधिपूर्वक किया और उसकी संतान पर आए संकट टल गए। कथा में यह संदेश है कि गोवत्स द्वादशी व्रत करने से संतान को दीर्घायु और सुखी जीवन मिलता है।
कहते हैं कि माता यशोदा ने भी भगवान श्रीकृष्ण के लिए यह व्रत किया था। तभी से यह व्रत मातृप्रेम और संतान की सुरक्षा के प्रतीक के रूप में प्रचलित हुआ।
ग्रामीण अंचलों में विशेष उत्सव
भारत के कई राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में इस पर्व को बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गायों को सजाकर, उन्हें हल्दी-कुमकुम लगाकर पूजा करते हैं और संतान की सुख-शांति की कामना करते हैं।
गोवत्स द्वादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संस्कार, संस्कृति और गौमाता के प्रति श्रद्धा का पर्व है। यह दिन हमें गौ सेवा और संतान की भलाई के लिए व्रत-पूजन की प्रेरणा देता है। संतान की लंबी उम्र और सुखद जीवन की कामना रखने वाली माताओं के लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।
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