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सत्य स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने का अवसर है देवी मूर्ति माँ सरस्वती,ऐसे करनी चाहिए पूजा

जनता से रिश्ता वेबडेस्क: सरस्वती शिक्षा की देवी हैं। वे ज्ञान, विद्या, बुद्धि, विवेक और पवित्रता की प्रतिमूर्ति हैं। देवी सूक्त के अनुसार वे सभी प्राणियों में बुद्धि और चेतना के रूप में विद्यमान हैं। कहते हैं कि उनके दर्शन से मंदबुद्धि भी गुणवान और बौद्धिकता से संपन्न हो जाता है। महाकवि कालिदास देवी कृपा पाकर उच्च कोटि की काव्य रचनाएं कर पाए थे। देखा जाए तो सिर्फ मूर्त्ति पूजा या वाह्य दर्शन से देवी की पूजा नहीं होती है और न ही उनकी कृपा प्राप्त होती है। देवी की मूर्ति में छिपे सत्य स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने का यह अवसर है, सरस्वती पूजा, यानी वसंत पंचमी। उनके दिव्यगुण और शक्तियों के सूक्ष्म दर्शन से ही जिज्ञासुओं के जीवन सफल और सार्थक हो सकते हैं।
देवी की चार भुजाएं रूहानी ज्ञान, योग, धारणा और निस्वार्थ सेवा की सूचक हैं। ये मानव समुदाय में विश्व बंधुत्व और वसुधैव कुटुंबकम की भावना और वृत्ति चारों ओर फैलाने की प्रतीक हैं। उनके एक हाथ में विद्यमान पुस्तक आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से आत्मोत्थान और विश्व कल्याण के प्रति उत्साह देती है। दूसरे हाथ की स्फटिक माला मनुष्य को नियमित परमात्मा का सिमरन करने की और उनसे सुख-शांति व शक्ति पाने की उमंग भरती है। देवी के तीसरे हाथ में वीणा है, जो भक्तों को दैवीय गुणों को धारण करने और संतुलित व सुखमय जीवन जीने की कला और कौशल सिखाती है। उनके चौथे हाथ में मौजूद कमंडल व्यक्ति, वातावरण, समाज, प्रकृति और पर्यावरण को शुद्ध, स्वच्छ व स्वस्थ रखने के लिए मन, वचन और कर्म से पवित्र बनने और दूसरों को पवित्र बनाने की प्रेरणा देता है।





